गुना: आजाद की यह फोटो खनियाधाना में ही खींची गई थी।स्वाधीनता संग्राम में पंचायत मंत्री महेंद्र सिसोदिया के परिवार का ही नहीं ससुराल पक्ष का भी विशेष योगदान रहा है। एक ओर जहां उनके दादा स्व सागर सिंह सिसोदिया का जिले के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में शुमार होता है, वहीं उनकी पत्नी शिवा राजे सिसोदिया के परिवार ने भी इस समर में अपनी प्रमुख भूमिका निभाई है। शहीद चंद्रशेखर आजाद की मूंछों वाली तस्वीर महाराजा खलक सिंह जूदेव ने बनवाई थी जो प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री महेंद्र सिंह सिसोदिया के परदादा ससुर थे। शिवपुरी जिले के खनियाधाना स्वातंत्र्य समर का जीता जागता दस्तावेज है। न केवल खनियाधाना राजपरिवार बल्कि यहां की जनता ने भी अंग्रेजों से दो दो हाथ किये थे।कैसे मिले आजाद और खलक सिंह जूदेवरोल्स रॉयस कार की सर्विसिंग के बाद झांसी से एक मैकेनिक महाराजा खलक सिंह जूदेव के साथ उनकी स्वतंत्र रियासत खनियाधाना जा रहा था। बुंदेलखंड गैराज के मालिक अलाउद्दीन ने उसे महाराजा के साथ इसलिए भेजा, ताकि रास्ते में अगर गाड़ी खराब हो जाए तो राजा साहब को कोई तकलीफ न हो। राजा साहब ने रास्ते में एक जगह गाड़ी रोकी और पेशाब करने चले गए। तभी झाड़ियों में से एक सांप उनकी तरफ बढ़ रहा था। मैकेनिक की निगाह जैसे ही सांप पर पड़ी उसने बिना देरी किए तपाक से अपना तमंचा निकाला और सटीक निशाना लगाते हुए सांप को मार गिराया।मैकेनिक की सूझ-बूझ और सटीक निशाने को देख राजा हैरान रह गए। इसी हैरानी के बीच राजा के मन में मैकेनिक के प्रति संदेह भी हुआ। गाड़ी खनियाधाना के पास बसई गांव के रेस्टहाउस पर रुकी। राजा साहब मैकेनिक को लेकर एकांत में गए और उन्होंने पूछा, कौन हो तुम? और किस मकसद से मेरे पास आए हो। राजा साहब ने कहा कि वो बिना किसी संकोच के उन्हें अपनी असलियत बता सकता है और वो इसके बारे में किसी से नहीं कहेंगे। तब मैकेनिक ने उन्हें काकोरी कांड का पूरा किस्सा सुनाते हुए बताया कि वो हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के चंद्रशेखर आजाद हैं।खनियाधाना बना क्रांतिकारियों का ट्रेनिंग सेंटरयहीं से शुरू होता है महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद और खनियाधाना का रिश्ता। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से लगभग 100 किलोमीटर दूर खनियाधाना तहसील है, जो कभी स्वतंत्र खनियाधानी रियासत हुआ करती थी और जिसका योगदान भारतीय क्रांतिकारी इतिहास में अमिट है, लेकिन धीरे-धीरे धुंधलाता जा रहा है। खनियाधाना स्टेट के राजा खलक सिंह जूदेव राष्ट्रभक्त थे। इसी लिए आजाद एक खास योजना के तहत उनके साथ मैकेनिक बनकर झांसी से निकले थे। ताकि राजा साहब से मुलाकात हो सके और सही समय आने पर उन्हें असलियत बता उनसे आर्थिक और शस्त्रों के लिए मदद ली जा सके।काकोरी कांड के बाद चंद्रशेखर आजाद झांसी आए और यहां उन्होंने बचे हुए संगठन को इकट्ठा करने का काम किया। इसके लिए उन्हें धन और हथियारों की जरूरत थी. ऐसे में खलक सिंह जूदेव से बढ़कर कौन मदद कर सकता था। जब जूदेव को आजाद की असलियत का पता चला तो वो उन्हें गोविंद बिहारी मंदिर का पुजारी बना पंडित हरिशंकर शर्मा का छद्म नाम देकर खनियाधाना ले आए। ये राज उन्होंने सिर्फ अपने तक ही सीमित रखा। आजाद 6-7 महीने खनियाधाना के गोविंद बिहारी मंदिर में रुके। रात को वो यहां आराम करते और दिन में तीन किलोमीटर दूर सीतापाठा मंदिर की पहाड़ी पर चले जाते और बमों की टेस्टिंग करते।इनहींपट्ठारों पर आजाद बम की टेस्टिंग किया करते थे।अपने अज्ञातवास के दौरान जब आजाद खनियाधाना रहे थे, तब उन्हें बम बनाने का जरूरी सामान राजा जूदेव उपलब्ध करा देते थे। यहां आजाद ने बम बनाए और उन्हें टेस्ट भी किया। उनके टेस्ट किए बमों के निशान आज भी सीतापाठा की चट्टानों पर मौजूद हैं। हालांकि ये दुख की बात है कि अमृतसर के जलियांवाला बाग में अंग्रेजों की एक-एक गोली सहेज कर रखने वाले देश में महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर के बमों के निशान आज भी आजाद हैं। देखभाल के आभाव में ये निशान धीरे-धीरे आजाद की तरह ही खुद को खत्म करते जा रहे हैं।मूंछों में ताव देते आजाद की तस्वीर का इतिहासचंद्रशेखर आजाद की सिर्फ दो तस्वीरें ही मिलती हैं। इनमें से एक जिसमें वो आधे नंगे बदन मूंछों पर ताव देते हुए दिखते हैं। ये तस्वीर खनियाधाना से आजाद का एक और संबंध बयां करती है। आजाद की ये दमदार तस्वीर खनियाधाना में ही बनाई गई थी। आजाद एक रोज गोविंद बिहारी मंदिर पर नहा कर आए थे, तब खनियाधाना के मम्माजू पेंटर ने उनकी ये तस्वीर बनाई थी। आजाद ने तस्वीर बनाने से इनकार किया, लेकिन खलक सिंह जूदेव के आग्रह और ये आश्वासन देने कि इसका कोई गलत इस्तेमाल नहीं होगा, आजाद राजी हो गए।गांव में लगी आजाद की प्रतिमा।इस ऐतिहासिक तस्वीर में आजाद के साथ एक और अहम चीज दिखाई देती है, जिसका योगदान भी भारतीय क्रांतिकारी इतिहास में अमिट है। वो है आजाद की कमर में रौब से लटका उनका ‘बमतुल बुखारा।’ यही कहकर पुकारते थे आजाद अपनी पिस्तौल को, जो उन्हें खनियाधाना के महाराज खलक सिंह जूदेव ने ही दी थी। इस पिस्तौल को आजाद को दिए जाने का किस्सा भी खाफी खास है। खलक सिंह जूदेव के पोते और पिछोर के पूर्व विधायक भानू प्रताप सिंह बताते हैं कि आजाद ने रोजाना होने वाली बैठकों में से एक दिन राजा खलक सिंह जूदेव से एक अंग्रेजी पिस्तौल का आग्रह किया। खलक सिंह ने अपने प्रिय मित्र की इस इच्छा को सुनते ही राज्य को एक जैसी दो रिवॉल्वर खरीदने का आदेश दिया। तब ऐसी आधुनिक रिवॉल्वर खरीदने के लिए वायसराय की अनुमति लेनी होती थी और उसे खरीदने का कारण बताना होता था।खनियाधाना ने दिया ‘बमतुल बुखारा’हालांकि राजा खलक सिंह जूदेव के पत्र पर रिवॉल्वर खरीदने की इजाजत मिल गई और एक जैसी गोलियों वाली दो रिवॉल्वर खरीदी गईं। राज्य के शस्त्र रिकॉर्ड में आमद दर्ज होने के बाद राजा जूदेव ने अपने रोजनामचे में शिकार खेलने जाने की रवानगी डाली और दूसरे दिन लौटकर रोजनामचे में लिखा की राजा के शिकार खेलते समय नदी के ऊपर से उनके घोड़े ने छलांग मारी और इस दौरान रिवॉल्वर कमर से छूटकर नदी में गिर गयी। इसके बाद गोताखोरों से बहुत खोज कराई गई, लेकिन रिवॉल्वर नहीं मिली।महाराजा खलक सिंह जूदेव।असल में वो रिवॉल्वर गोविंद बिहारी के मंदिर में आजाद को सौंपी गई। जूदेव ने एक जैसी दो रिवॉल्वर इसलिए ली थीं, ताकि उसके लिए गोलियां ली जाएं और आजाद को दी जा सकें। आजाद नहाकर आए थे तब उन्होंने उस रिवॉल्वर को लिया और अपनी कमर में बांधकर मूछों पर ताव देते हुए अपना फोटू खिंचवाया। आजाद की शहादत के बाद उनकी बंदूक आज प्रयागराज के म्यूजियम में है। वहीं जो दूसरी बंदूक थी वो काफी समय तक खनियाधाना रियासत के पास रही, लेकिन अब वो डिस्पोज की जा चुकी है। भानू प्रताप सिंह बताते हैं कि वो बंदूक बहुत शानदार थी, उसकी मारक क्षमता भी काफी अच्छी थी, लेकिन अब उसे डिस्पोज कर दिया है। आजाद और खलक सिंह जूदेव के बीच घनिष्ठ संबंधों और क्रांतिकारी इतिहास में खनियाधाना के निशान अब जूदेव की बंदूक की तरह ही धीरे-धीरे धुंधलाते जा रहे हैं।


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