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मप्र में रोज हजारों एकड़ फसल बर्बाद कर रहीं नीलगाय व सुअर

भोपाल । प्रदेश में किसानों के लिए इस समय नीलगाय व सुअर सबसे बड़ी समस्या बने हुए हैं। आलम यह है कि प्रदेश में नीलगाय और सुअर रोज हजारों एकड़ फसल बर्बाद कर रहे हैं। प्रदेश के 36 जिलों में नीलगाय और सुअर की संख्या लगातार बढ़ रही है। लेकिन किसानों के लिए परेशानी यह है कि वे इन्हें मार नहीं सकते हैं। अनुमति के अधिकार अनुविभागीय राजस्व अधिकारी से छीनकर एसडीओ वन को दिया जाना प्रस्तावित है। प्रारूप जुलाई 2021 में सरकार को भेजा गया है। विधायकों से भी सुझाव मांगे गए हैं, पर निर्णय नहीं हो पा रहा है।
गौरतलब है कि प्रदेश में पानी, बिजली और अनाज का सही मूल्य नहीं मिलने से किसान पहले से ही परेशान हैं। अब किसानों के लिए नीलगाय और सुअर भी बड़ी समस्या बने हुए हैं। रतलाम, मंदसौर, नीमच, देवास, छतरपुर, सागर, रीवा, शहडोल सहित 36 जिलों में नीलगाय की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई जिलों में सुअर किसानों को परेशान कर रहें हैं। इसके सही आंकड़े वन विभाग के पास भी नहीं हैं, पर विभाग मानता है कि संख्या में वृद्धि हुई है।
उल्लेखनीय है कि नीलगाय और सुअर का मामला विधानसभा में कई बार उठ चुका है, लेकिन हल नहीं निकल रहा। सरकार पिछले एक साल में नीलगाय और सुअर के शिकार के नियमों को सरल नहीं कर पाई है। इसका प्रस्ताव सरकार स्तर पर लंबित है। सूअर, हिरन की तरह नीलगाय भी खड़ी फसलों को बर्बाद करती हैं। यह दूसरे वन्यप्राणियों की तुलना में ज्यादा नुकसान करती हैं। इससे परेशान किसान कई साल से सरकार से गुहार लगा रहे हैं। वनमंत्री ने लिखित जबाव में कहा है कि नीलगाय से फसलों को होने वाले नुकसान की भरपाई सरकार करती है। किसानों को मुआवजा दिया जाता है। हालांकि सरकार के पास इस समस्या का स्थाई हल अब भी नहीं है। सरकार करीब 10 साल से नीलगाय की संख्या नियंत्रित करने पर काम कर रही है। पहले नसबंदी पर काम किया गया, जो असफल रहा। इसके बाद नीलगाय के शिकार के नियम सरल करने पर मंथन हुआ। वन विभाग ने करीब डेढ़ साल में संशोधन का प्रारूप तैयार किया, जिसमें नीलगाय के शिकार की
इंदौर, उच्जैन, पन्ना, छतरपुर, रीवा सर्किल से जुड़े क्षेत्र में नीलगाय और खंडवा, होशंगाबाद, रायसेन, इटारसी, मंडला, उमरिया, डिंडोरी व टाइगर रिजर्व के आसपास के क्षेत्र में जंगली सूअर किसानों के लिए बड़ी समस्या बन चुके हैं। वहीं ग्वालियर एयरपोर्ट स्टेशन इन दिनों नीलगाय से परेशान है। महाराजपुरा स्थित एयरफोर्स स्टेशन के लिए आसपास के जंगल में घूमने वाली 100 से ज्यादा नीलगाय परेशानी का सबब बनी हुई है। दरअसल तार फेसिंग टूटने और बड़ी बाउंड्री वॉल  ना होने के चलते एयरफोर्स स्टेशन के पिछले हिस्से से नील गायों के झुंड अंदर घुस आते हैं। कैंपस में घुसने के बाद नीलगाय कई बार रनवे तक पहुंच जाती है, जिससे एयर फोर्स के फायटर प्लेन के हादसे का शिकार होने की आशंकाएं बढ़ रही है। नीलगाय को रोकने के लिए एयरफोर्स ने बाउंड्री वॉल के आसपास संख्या में कर्मचारियों की तैनाती की है। इसके बावजूद नीलगाय की बढ़ती संख्या एयरफोर्स स्टेशन के लिए परेशानी बन गई है।
हथियार लाइसेंसी शिकार कर सकेगा। यदि किसी के पास लाइसेंस नहीं है तो वह उस जिले के किसी भी दूसरी लाइसेंसी व्यक्ति से शिकार करा सकेगा। फॉर्म में दोनों के नाम संयुक्त रूप से लिखे रहेंगे। समय सीमा तय रहेगी। आवेदन मिलने के बाद रेंजर पांच दिन के भीतर जाकर देखेगा और उसकी रिपोर्ट के बाद तीन दिन में एसडीओ मंजूरी देगा। निजी जमीन पर जानवर को मारने के बाद यदि वह जंगल में जाकर मरता है, तो इसमें कोई विवाद नहीं होगा। एक बार में पांच-पांच जंगली सूअर या नीलगाय को मारने की इजाजत रहेगी। मौजूदा एक्ट में जंगली सूअर और नीलगाय को मारने की स्वीकृति एसडीएम देते हैं। शिकारी के पास गन का लाइसेंस होने के साथ ही उस व्यक्ति का रजिस्टर्ड शिकारी होना जरूरी है। सूअर व नीलगाय को मारते समय उसका निजी जमीन पर होना जरूरी है। शिकारी को ही यह लिखकर देना होगा कि जिसे उसने मारा है, वही फसल का नुकसान करता था। शिकार के बाद शव निजी जमीन पर ही मिलना चाहिए। सूअर की संख्या 10 तय थी, जबकि नीलगाय की कोई संख्या तय नहीं थी। आवेदन और उसकी स्वीकृति की कोई समय सीमा नहीं थी।

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