ट्रंप का बड़ा ऐलान: रूसी तेल खरीदने वाले देशों को टैरिफ से राहत, भारत को मिली बड़ी राहत
रूस पर प्रतिबंधों और भारी टैरिफ के प्रावधानों पर लगाई रोक, मार्को रुबियो बोले- 60 दिन तक होगा फैसले के असर का आकलन
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित भारी टैरिफ और रूस से जुड़े कई प्रतिबंधों के प्रावधानों को फिलहाल छूट देने का फैसला किया है। इस कदम से भारत और चीन समेत रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों को राहत मिली है। ट्रंप ने यह फैसला ऐसे समय में लिया है, जब रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा आपूर्ति तथा ईंधन की कीमतों को लेकर दबाव बना हुआ है।
ट्रंप ने अपने फैसले को अमेरिका के राष्ट्रीय हित में बताया है। वहीं, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि प्रशासन इस बात का आकलन करना चाहता है कि रूस पर प्रतिबंध लगाने और रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने से अमेरिकी तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा। इसके लिए करीब 60 दिनों की समीक्षा अवधि रखी गई है।
भारत समेत पांच देशों को मिल सकती है राहत
अमेरिका में पारित नए कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान था। इसका उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध को लेकर मॉस्को पर दबाव बनाना था।
रूसी कच्चे तेल के प्रमुख खरीदारों में भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। प्रस्तावित टैरिफ का असर इन देशों से अमेरिका में आने वाले सामान पर पड़ सकता था।
ट्रंप के ताजा फैसले से इन देशों को फिलहाल राहत मिली है। हालांकि, यह छूट स्थायी है या आगे चलकर इसमें बदलाव होगा, यह अमेरिकी प्रशासन के अगले फैसलों पर निर्भर करेगा।
क्या है ग्रैहम एक्ट?
इस फैसले का संबंध लिंडसे ओ. ग्रैहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 से है। इस कानून का उद्देश्य रूस पर प्रतिबंधों का दबाव बढ़ाना और रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों के खिलाफ टैरिफ जैसे आर्थिक उपायों का इस्तेमाल करना है।
कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को राष्ट्रीय हित के आधार पर कुछ प्रतिबंधों और टैरिफ से छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। ट्रंप ने इसी प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए संबंधित उपायों को फिलहाल रोकने का फैसला किया।
यह कानून रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में लाया गया था। इसके समर्थकों का मानना है कि आर्थिक दबाव से रूस को युद्ध समाप्त करने की दिशा में कदम उठाने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
मार-ए-लागो में ट्रंप ने क्या कहा?
शनिवार को फ्लोरिडा के पाम बीच स्थित मार-ए-लागो रिसॉर्ट में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि उनके फैसले को लेकर अभी कई बातें स्पष्ट होनी बाकी हैं। उन्होंने संकेत दिया कि प्रशासन आगे की परिस्थितियों और फैसले के प्रभाव का आकलन करेगा।
ट्रंप ने इस कदम को अमेरिका और दुनिया के लिए अच्छा बताया। उनके प्रशासन के सामने एक तरफ रूस पर दबाव बनाए रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ वैश्विक ऊर्जा बाजार में आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित रखने का सवाल भी है।
मार्को रुबियो ने 60 दिन की समीक्षा की बात कही
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप लगभग 60 दिनों तक इस बात का आकलन करना चाहते हैं कि रूस से जुड़े प्रतिबंधों और टैरिफ को लागू करने का अमेरिका तथा दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
रुबियो ने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार बताया। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारत ने ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है, लेकिन रूसी तेल अब भी उसकी ऊर्जा जरूरतों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस समीक्षा अवधि में अमेरिकी प्रशासन ऊर्जा बाजार, व्यापार और प्रतिबंधों के संभावित प्रभावों पर विचार कर सकता है। इसलिए फिलहाल मिली राहत को स्थायी नीति में बदलाव मानना जल्दबाजी होगी।
अमेरिका में ट्रंप के फैसले पर उठे सवाल
ट्रंप के इस कदम की अमेरिका में आलोचना भी हुई है। आलोचकों का तर्क है कि रूस पर आर्थिक दबाव कम करने से राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यूक्रेन में अपना सैन्य अभियान जारी रखने में मदद मिल सकती है।
मैसाचुसेट्स की डेमोक्रेटिक सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने ट्रंप के फैसले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि इससे रूस पर दबाव बनाने के उद्देश्य को नुकसान पहुंच सकता है। वहीं, रूस पर सख्त कार्रवाई के समर्थकों का मानना है कि प्रतिबंधों में ढील देने से मॉस्को को गलत संदेश जा सकता है।
दूसरी ओर, ऊर्जा की कीमतों और आपूर्ति को लेकर चिंताएं अमेरिकी प्रशासन के फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के कारण तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ने से अमेरिका समेत कई देशों पर आर्थिक दबाव पड़ रहा है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। रूस से तेल की खरीद भारतीय ऊर्जा आपूर्ति का एक अहम हिस्सा रही है। ऐसे में रूसी तेल खरीदने के कारण भारतीय सामान पर अमेरिका में भारी टैरिफ लगाए जाने का खतरा व्यापारिक संबंधों को प्रभावित कर सकता था।
ट्रंप के फैसले से भारत को फिलहाल इस संभावित दबाव से राहत मिली है। इससे भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और ऊर्जा खरीद से जुड़ी रणनीति को लेकर आगे बातचीत की गुंजाइश बनी रह सकती है।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत के सभी व्यापारिक विवाद समाप्त हो गए हैं या भविष्य में कोई टैरिफ नहीं लगाया जाएगा। अमेरिकी प्रशासन की समीक्षा और आने वाले फैसले इस मामले में महत्वपूर्ण होंगे।
आगे क्या होगा?
फिलहाल ट्रंप प्रशासन ने रूस से संबंधित कुछ प्रतिबंधों और टैरिफ प्रावधानों को राष्ट्रीय हित के आधार पर छूट दी है। मार्को रुबियो के बयान के अनुसार, अगले 60 दिनों में इसके आर्थिक प्रभावों का आकलन किया जाएगा।
इस अवधि के बाद अमेरिका रूस पर दबाव बढ़ाने, मौजूदा छूट जारी रखने या नीति में बदलाव करने का फैसला कर सकता है। भारत समेत रूसी तेल खरीदने वाले देशों की नजर अब वॉशिंगटन के अगले कदम पर रहेगी।
कुल मिलाकर, ट्रंप का यह फैसला रूस पर आर्थिक दबाव बनाने की अमेरिकी नीति और वैश्विक ऊर्जा बाजार की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। भारत को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन इस राहत की अवधि और भविष्य की व्यापार नीति को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

