मदद करने पर भी नहीं बख्शा! अफगान नागरिक समेत दर्जनों प्रवासियों को अमेरिका ने भेजा अफ्रीका
नई दिल्ली, 30 अगस्त 2026। अमेरिका ने शनिवार, 29 अगस्त को दर्जनों प्रवासियों को सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य भेज दिया। इनमें एक युवा अफगान नागरिक भी शामिल है, जिसके परिवार के सदस्यों ने अमेरिकी सेना के साथ काम किया था। खास बात यह है कि इस अफगान नागरिक को अमेरिकी जज ने अफगानिस्तान भेजे जाने से सुरक्षा दी थी, क्योंकि उसे तालिबान से उत्पीड़न का खतरा था। इसके बावजूद उसे तीसरे देश यानी सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य भेज दिया गया।
अमेरिकी सेना के साथ काम कर चुका है परिवार
रिपोर्ट के मुताबिक, अफगान नागरिक की उम्र करीब 20 साल है। उसके वकील अल्मा डेविड के अनुसार, अमेरिकी अदालत ने उसे अफगानिस्तान भेजने से सुरक्षा दी थी। अदालत में पेश दस्तावेजों में बताया गया कि उसके परिवार को तालिबान की ओर से धमकियां मिली थीं, क्योंकि उसके भाइयों ने अमेरिकी सेना के समर्थन में काम किया था।
वकील के मुताबिक, उसका एक भाई अमेरिका में रहता है और अफगान नेशनल आर्मी में काम कर चुका है। यह सेना 2021 में तालिबान के सत्ता में आने से पहले अमेरिकी सेना के साथ मिलकर काम करती थी। उसका दूसरा भाई अमेरिकी प्रशिक्षण प्राप्त पायलट था, जिसकी तालिबान ने हत्या कर दी थी।
12 अफगान और 8 ईरानी नागरिक भेजे गए
शनिवार को सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य की राजधानी बांगुई पहुंची निर्वासन उड़ान में 12 अफगान और 8 ईरानी नागरिक शामिल थे। इसके अलावा नेपाल और निकारागुआ के नागरिक भी इस उड़ान में मौजूद थे। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स फर्स्ट के अधिकारी सावी अरवे ने इन आंकड़ों की जानकारी दी।
एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, इस उड़ान में दर्जनों लोग थे और यह अमेरिका की उस नीति का हिस्सा है, जिसके तहत कुछ प्रवासियों को उनके मूल देश के बजाय तीसरे देशों में भेजा जा रहा है।
तीसरे देश भेजने की नीति पर सवाल
अमेरिका की इस प्रक्रिया को लेकर इमिग्रेशन वकीलों और मानवाधिकार संगठनों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि तीसरे देशों में भेजने की व्यवस्था का इस्तेमाल कुछ शरण मांगने वालों को अप्रत्यक्ष रूप से उन देशों के करीब पहुंचाने के लिए किया जा रहा है, जहां लौटने पर उन्हें खतरा हो सकता है।
अधिकार संगठनों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने ऐसे करीब दो दर्जन देशों के साथ समझौते किए हैं, जहां कुछ प्रवासियों को भेजा जा रहा है। इन लोगों के उन देशों से सीधे संबंध नहीं होने के बावजूद उन्हें वहां भेजे जाने को लेकर कानूनी और मानवीय चिंताएं उठ रही हैं।
जून के बाद दूसरी ऐसी उड़ान
सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य के लिए शनिवार की उड़ान जून के बाद दूसरी ऐसी निर्वासन उड़ान थी। जून में भी करीब दो दर्जन प्रवासियों को वहां भेजा गया था। उस समूह में एक ईरानी महिला भी शामिल थी, जिसे अपने देश में उत्पीड़न का सामना करने का खतरा बताया गया था।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी जून में सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य को अमेरिका द्वारा निर्वासित लोगों के लिए एक ‘थर्ड कंट्री’ के तौर पर इस्तेमाल किए जाने पर चिंता जताई थी। संगठन ने कहा था कि अफगानिस्तान और ईरान जैसे देशों में लौटने वाले कुछ लोगों को उत्पीड़न या गंभीर नुकसान का खतरा हो सकता है।
कानूनी संरक्षण के बावजूद भेजे जाने पर विवाद
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल उस अफगान नागरिक को लेकर है, जिसे अमेरिकी जज से अफगानिस्तान भेजे जाने के खिलाफ सुरक्षा मिली थी। उसके वकील का कहना है कि उसे तालिबान से उत्पीड़न का खतरा था और उसके परिवार के अमेरिकी सेना से जुड़े होने के कारण पहले ही धमकियां मिल चुकी थीं।
मानवाधिकार संगठनों और इमिग्रेशन वकीलों का कहना है कि ऐसे मामलों में निर्वासन की प्रक्रिया के दौरान अदालतों द्वारा दी गई सुरक्षा और शरणार्थियों के अधिकारों को ध्यान में रखना जरूरी है। इसी वजह से सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य भेजे गए इन प्रवासियों का मामला अब कानूनी और मानवीय बहस का विषय बन गया है।
अमेरिका की ओर से प्रवासन और निर्वासन नीति के तहत तीसरे देशों के साथ किए गए समझौतों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। इस नीति के समर्थक इसे अवैध प्रवासन पर नियंत्रण का तरीका बताते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे उन लोगों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, जिन्हें अपने मूल देशों में उत्पीड़न का खतरा है।
रिपोर्टर; गरिमा छाबड़ा, विशेष रिपोर्टर, विपणन प्रबंधक, जनसंपर्क प्रबंधक

