पानीपत: ट्रैक्टर की ट्यूब की किश्ती और चप्पलों की चप्पू से यमुना पार करते ग्रामीण।हरियाणा के पानीपत के सनौली क्षेत्र के गांव रहमपुर को भगवान की भी और प्रशासन की भी रहम की खास जरुरत है। जून-जुलाई-अगस्त माह में ये गांव बरसाती मौसम की मार झेलता है। तो वहीं बाकी महीनों में अन्य प्रकार की सुविधाओं के लिए ये लोग तरस जाते हैं। रहमपुर गांव को भगवान और प्रशासन दोनों की ही रहम की जरुरत है। मगर आलम यह है कि इस गांव की दोनों में कोई भी नहीं सुन रहा है।करीब 6 दशक पहले यमुना की तलहटी में बसे इस गांव रहमपुर के 80 घरों में रह रही 250 की आबादी कहने को तो हरियाणा में है, लेकिन साल के तीन महीने पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की होकर रह जाती है।गांव रहमपुर का निवासी रवि, मिर्जापुर जाने के लिए ट्यूब ले जाता हुआ।ये वो 3 महीने होते हैं, जब मानसून में दोनों राज्यों की सीमारेखा का काम कर रही यमुना नदी उफान पर होती है। सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली छात्रों को होती है। बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल से आते-जाते हैं। इस सफर में इनका सहारा ट्रैक्टर के टायर की ट्यूब की कश्ती होती है। पैरों में पहनी जाने वाली चप्पलें चप्पू बन जाती हैं।प्रशासन भी नहीं करता कोई पुख्ता इंतजामबता दें कि इन दिनों यमुना का जलस्तर खतरे के निशान 230 मीटर से 5 फीट ऊपर चल रहा है। वहीं, हिमाचल की पहाड़ियों में हो रही भारी बरसात के कारण पड़ोसी राज्यों और जिलों की नदियों से भी पानी आगे की ओर छोड़ दिया गया है।इस पानी से रहमपुर में बाढ़ की स्थिति बन गई है। हैरत की बात यह है कि किसी अनहोनी से बचने के लिए इस गांव के लिए प्रशासन के कोई भी पुख्ता इंतजाम नजर नहीं आए। यह गांव साल के 9 महीने हरियाणा और 3 महीने उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहता है।तीन गांवों को जोड़ता है ये रास्ता।2 किलोमीटर की दूरी जान जोखिम में डालकर होती है तययहां के बाशिंदों के लिए अन्य जरूरी कामों के साथ बच्चों को पढ़ाई के लिए जान जोखिम में डालना रोज का किस्सा है। इन्हें रबड़ ट्यूब के सहारे रोज नदी पार करते देखा जा सकता है। हालांकि मानसून को छोड़कर यमुना सूखी रहती है।लोग अपने रोजाना के काम के लिए आसानी से हरियाणा का आवागमन कर लेते हैं। जब बारिश आती है तो शहर से संपर्क एकदम टूट जाता है। मात्र 2 किलोमीटर दूर दूसरे गांव में जाने के लिए या तो इन लोगों को नदी में जान जोखिम डालकर जाना पड़ता है। या फिर यूपी के रास्ते 20 किलोमीटर दूरी तय करनी पड़ती है।गांव में न स्कूल और न स्वास्थ्य केंद्रजहां तक सरकारी सुविधाओं की बात है, रहमपुर गांव में न तो कोई स्कूल है और न ही कोई स्वास्थ्य केंद्र हैं। इन सुविधाओं के लिए ग्रामीणों को करीब साढ़े 700 मीटर की यमुना और फिर इतना ही कच्चा रास्ता पार करके नजदीकी गांव मिर्जापुर आना-जाना पड़ता है। यमुना पार करने के लिए लोग ट्रैक्टर की ट्यूब का सहारा लेते हैं। चप्पू का काम करती हैं चप्पल। इन्हें लोग हाथों में पहनकर पानी को काटते हैं।गांव में लगातार बढ़ रहे जलस्तर को देखता बुजुर्ग किसान।2014 में पहुंची थी बिजली2014 से पहले रहीमपुर गांव बिजली से भी महरूम था। 60 साल पुराने गांव में 8 साल पहले ही बिजली पहुंची है। कभी हरियाणा तो कभी उत्तर-प्रदेश का गांव होने के कारण किसी राजनेता ने गांव का ध्यान नहीं दिया। ग्रामीणों की काफी मशक्कत के बाद गांव में रोशनी हुई। लोगों में प्रशासन, जन प्रतिनिधियों के प्रति काफी नाराजगी है।अधिकतर परिवार कर चुके हैं पलायनमानसून के दौरान गांव की स्थिति को देखते हुए अधिकतर परिवार गांव रहीमपुर से पलायन कर चुके हैं। 60 साल पहले बसे गांव में कभी लोगों की रौनक हुआ करती थी। अब गांव में करीब 80 घर और केवल 250 लोगों की आबादी है।यमुना के बढ़ते-घटते जलस्तर और कटाव के कारण हर मानसून में गांव का संपर्क टूटा जाता है। वाहन से UP के कैराना की मुख्य सड़क तक पहुंचने में भी लोगों को करीब ढाई घंटा लगता है। इसमें से मात्र चार किलोमीटर का रास्ता ही 2 घंटे में पार होता है।


Comments are closed.