ठाणे डॉक्टर हमला मामला: शिवसेना कॉर्पोरेटर रमेश म्हात्रे ने किया सरेंडर, तीन अन्य आरोपी भी जेल भेजे गए
महाराष्ट्र के ठाणे जिले में डॉक्टरों से कथित मारपीट के मामले में शिवसेना कॉर्पोरेटर और मुख्य आरोपी रमेश म्हात्रे ने तीन अन्य आरोपियों के साथ ट्रायल कोर्ट में सरेंडर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत रद्द किए जाने के बाद सभी आरोपियों ने अदालत के सामने आत्मसमर्पण किया। इसके बाद उन्हें कल्याण की आधारवाड़ी जेल भेज दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की थी जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को रमेश म्हात्रे और अन्य आरोपियों को मिली जमानत रद्द करते हुए उन्हें ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि डॉक्टर और मेडिकल बिरादरी के लोग समाज की सेवा करते हैं और उनके खिलाफ हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं है। अदालत ने डॉक्टरों को बिना डर और दबाव के काम करने के लिए अस्पतालों में सुरक्षित माहौल बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया।
6 जुलाई को हुआ था विवाद
यह मामला 6 जुलाई 2026 को ठाणे जिले के डोंबिवली स्थित शास्त्री नगर नगर निगम अस्पताल का है। आरोप है कि रमेश म्हात्रे और उनके साथियों ने अस्पताल के लेबर वार्ड में ड्यूटी कर रहे तीन डॉक्टरों, जिनमें एक महिला डॉक्टर भी शामिल थीं, के साथ मारपीट और गाली-गलौज की। घटना के बाद इसका वीडियो भी सामने आया था।
मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज किया था। बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट से उन्हें जमानत मिल गई थी, जिसे महाराष्ट्र सरकार और शिकायतकर्ता पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
चार आरोपियों ने किया सरेंडर
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद रमेश म्हात्रे के अलावा रमेश पवार, प्रमोद उर्फ प्रकाश निकम और अक्षय शरद करंडे ने भी ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण किया। अदालत ने सभी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। अधिकारियों के मुताबिक, उन्हें कल्याण की आधारवाड़ी जेल भेजा गया है।
इस मामले में एक अन्य आरोपी साधना संजय करंडे पहले ही न्यायिक हिरासत में है। इस तरह डॉक्टरों पर कथित हमले के मामले में नामजद सभी पांच आरोपी अब हिरासत में हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करते हुए मेडिकल पेशेवरों की सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख अपनाया था। अदालत ने कहा कि डॉक्टरों को धमकी, दबाव या शारीरिक हिंसा के डर में काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि जनप्रतिनिधियों से कानून के शासन का सम्मान करने की अपेक्षा और अधिक होती है।
अब आरोपियों के खिलाफ मामले की आगे की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में होगी।
रिपोर्टर; ध्रुव सिंह, मुख्य संवाददाता पंजाब दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द
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