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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024: मुंबई का सियासी समीकरण उत्तर भारतीयों के साथ
– फोटो : अमर उजाला
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करीब साढ़े तीन दशक बाद पहला मौका है, जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उत्तर भारत के हिंदीभाषियों का विरोध कोई मुद्दा नहीं हैं। प्रचार के दौरान मुंबई में न तो छठ का विरोध हुआ और न ही शिवसेना (उद्धव) या महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) की ओर से हिंदीभाषियों के विरोध में आपत्तिजनक बयानबाजी हुई।
इसके उलट पहली बार महायुति और महाविकास आघाड़ी ने उत्तर भारतीयों को बड़ी संख्या में टिकट भी दिए हैं। कभी पहले दक्षिण भारतीयों के खिलाफ आंदोलन करने वाली शिवसेना ने नब्बे के दशक में हिंदीभाषियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था। शुरू में यह आंदोलन मराठीभाषी लोगों को अपने पक्ष में करने की राजनीति तक सीमित थी। हालांकि 2006 में शिवसेना से अलग मनसे बनाने वाले राज ठाकरे ने 2008 में आंदोलन को हिंसक रूप दे दिया। इस दौरान प्रतियोगी परीक्षा देने गए उत्तर भारतीयों के साथ मनसे कार्यकर्ताओं की झड़प हुई, तो हर बार छठ पर्व से पूर्व मनसे और तत्कालीन शिवसेना ने इसका तीखा विरोध किया। शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे ने कभी उत्तर भारतीयों को गोबर का कीड़ा बताते हुए परमिट व्यवस्था शुरू करने की मांग की थी।
महाराष्ट्र की राजनीति में अब आए इस बदलाव के पीछे नए सियासी समीकरण व उत्तर भारतीयों की मुंबई में एक तिहाई आबादी है। इसके अलावा नागपुर, नासिक व पुणे में भी इनकी प्रभावशाली उपस्थिति है। उत्तर भारतीयों का विरोध करने वाली शिवसेना-उद्धव गुट अब उस कांग्रेस, एनसीपी (शरद) के साथ मैदान में है, जिसने कभी उत्तर भारतीयों का विरोध नहीं किया है। वहीं, अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही मनसे नहीं चाहती कि उत्तर भारतीय मतदाता उसके खिलाफ हो जाएं।
मुंबई का सियासी समीकरण उत्तर भारतीयों के साथ
मुंबई की 36 में से 26 सीटों पर 40 लाख उत्तर भारतीयों का रुख तय करेगा कि सरकार किसकी बनेगी। मराठी भाषी मतदाता अब यहां बहुसंख्यक नहीं रह गए हैं। 2009 के चुनाव में जब मनसे व तत्कालीन शिवसेना ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ उग्र मुहिम शुरू की थी, तब नौ हिंदीभाषियों ने जीत दर्ज की थी। ऐसे में शिवसेना यूबीटी और मनसे को डर है कि उत्तर भारतीयों के विरोध के चलते कहीं वे उनके खिलाफ एकजुट न हो जाएं। यही वजह है कि छठ महापर्व के दौरान कोई विरोध देखने को नहीं मिला। भाजपा ने इस बार बोरिवली से संजय उपाध्याय को उतारकर उत्तर भारतीयों के थोक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की है। वहीं, ठाणे में दोनो शिवसेना की लड़ाई है।
पहली बार छठ की ऐसी धूम
नब्बे के दशक के बाद पहली बार इस वर्ष मुंबई के जुहू बीच पर महापर्व छठ मनाने के लिए उत्तर भारतीयों का हुजूम उमड़ा। यह बदलते माहौल का संकेत है।
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