क्या अपराधों की जड़ अपराधी हैं या व्यवस्था की निष्क्रियता?
बीट अधिकारी से लेकर पुलिस मुख्यालय तक—भारत की पुलिस व्यवस्था पर एक कठोर आत्ममंथन
सम्पादकीय
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द
सम्पादक : चरणजीत सिंह
भारत में पुलिस व्यवस्था को लेकर समय-समय पर अनेक प्रश्न उठते रहे हैं। कहीं अपराध होने के बाद पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल उठता है, कहीं प्राथमिकी दर्ज करने में कथित टालमटोल पर, कहीं जांच की गुणवत्ता पर, कहीं निर्दोष व्यक्ति को आरोपी बनाए जाने के आरोप लगते हैं और कहीं प्रभावशाली व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई न होने की शिकायत सामने आती है।
लेकिन इन तमाम प्रश्नों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है—
क्या भारत में होने वाले अपराधों के लिए पुलिस ही मुख्य रूप से जिम्मेदार है?
मेरा उत्तर है—नहीं।
अपराध का मूल कारण अपराधी की मानसिकता, सामाजिक परिस्थितियां, आर्थिक असमानता, नशा, लालच, पारिवारिक एवं सामाजिक विघटन, कानून के प्रति भय का कम होना और अनेक अन्य परिस्थितियां हो सकती हैं। अपराध करने वाला व्यक्ति अपराध के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार है।
लेकिन इसके साथ एक दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—
यदि अपराध पुलिस नहीं करती, तो क्या अपराध को रोकने, अपराध की सूचना मिलने पर तत्काल कार्रवाई करने और कानून का निष्पक्ष पालन कराने की जिम्मेदारी पुलिस की नहीं है?
यहीं से भारतीय पुलिस व्यवस्था की असली परीक्षा शुरू होती है।
बीट अधिकारी आखिर किसलिए है?
हर पुलिस थाना क्षेत्र को विभिन्न क्षेत्रों अथवा बीटों में बांटकर पुलिसकर्मियों को स्थानीय स्तर पर निगरानी और संपर्क की जिम्मेदारी दी जाती है। इसका मूल उद्देश्य यही होना चाहिए कि पुलिस को अपने क्षेत्र की गतिविधियों, संवेदनशील स्थानों, विवादों, असामाजिक तत्वों और संभावित अपराधों की समय रहते जानकारी हो।
कल्पना कीजिए—
एक बीट अधिकारी प्रतिदिन अपने क्षेत्र में घूमता है। उसे मालूम है कि किस इलाके में कौन रहता है, कौन-से स्थान संवेदनशील हैं, कहां आए दिन विवाद होते हैं, कहां अवैध गतिविधियों की शिकायतें आती हैं और किन परिवारों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है।
तो फिर सवाल है—
यदि उसे किसी संभावित अपराध की जानकारी पहले से मिलती है, तो उसे रोकने के लिए कार्रवाई क्यों नहीं होती?
क्या बीट व्यवस्था केवल यह पता लगाने के लिए है कि इलाके में क्या हो रहा है?
या इसका उद्देश्य यह भी है कि जो गलत होने जा रहा है, उसे गलत होने से पहले रोका जाए?
यदि पुलिस का काम केवल अपराध होने के बाद घटनास्थल पर पहुंचना है, तो फिर अपराध-निवारण की अवधारणा कहां गई?
“हमारा काम शांति बनाए रखना है”—लेकिन कैसी शांति?
पुलिस अधिकारियों से अक्सर यह सुनने को मिलता है कि उनका काम क्षेत्र में शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है।
बिल्कुल सही।
लेकिन शांति का अर्थ क्या है?
क्या शांति का अर्थ यह है कि अपराध हो जाए लेकिन कोई आवाज न उठाए?
क्या शांति का अर्थ यह है कि पीड़ित शिकायत करे तो उसे कहा जाए कि मामला बढ़ाओ मत?
क्या शांति का अर्थ यह है कि नागरिक अन्याय देखकर भी चुप रहे?
नहीं।
लोकतंत्र में शांति का अर्थ भय की चुप्पी नहीं, बल्कि कानून के शासन के भीतर सुरक्षित जीवन है।
जो नागरिक अपराध के विरुद्ध आवाज उठाता है, वह अशांति पैदा करने वाला नहीं, बल्कि कई बार व्यवस्था को अपराध की सूचना देने वाला नागरिक होता है।
अपराधी को रोकना पुलिस का दायित्व है।
अपराध की सूचना देना नागरिक का अधिकार और सामाजिक जिम्मेदारी है।
और दोनों के बीच पुल होना चाहिए—विश्वास।
आवाज उठाने वाला ही आरोपी क्यों बन जाए?
सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब शिकायतकर्ता को ही समस्या मान लिया जाए।
यदि कोई नागरिक पुलिस से कहता है कि उसके साथ अपराध हुआ है, तो पहली आवश्यकता यह है कि उसकी शिकायत को कानून के अनुसार दर्ज किया जाए और उसकी जांच हो।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 173 के तहत संज्ञेय अपराध से संबंधित सूचना पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को दी जा सकती है। यदि थाना प्रभारी सूचना दर्ज करने से मना करता है, तो संबंधित व्यक्ति पुलिस अधीक्षक को लिखित रूप से सूचना भेज सकता है और कानून में आगे न्यायिक उपाय का भी प्रावधान है।
अर्थात व्यवस्था में रास्ता मौजूद है।
फिर समस्या कहां पैदा होती है?
समस्या तब पैदा होती है जब कानून की व्यवस्था और उसके जमीनी क्रियान्वयन के बीच दूरी पैदा हो जाती है।
यदि शिकायतकर्ता को ही बार-बार थाने बुलाया जाए, उसकी बात सुनी न जाए, उसे समझौते के लिए दबाव दिया जाए अथवा उसकी शिकायत को गंभीरता से न लिया जाए, तो नागरिक का पुलिस व्यवस्था से विश्वास कमजोर होता है।
और जिस व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत नागरिकों का विश्वास हो, उसके लिए इससे बड़ी चुनौती कोई दूसरी नहीं हो सकती।
प्राथमिकी दर्ज करना प्रक्रिया का अंत नहीं, शुरुआत है
किसी शिकायत को दर्ज कर लेना ही पुलिस की जिम्मेदारी पूरी नहीं कर देता। वास्तविक परीक्षा इसके बाद शुरू होती है।
जांच निष्पक्ष होनी चाहिए। साक्ष्यों को सुरक्षित किया जाना चाहिए। गवाहों के बयान कानून के अनुसार दर्ज होने चाहिए और किसी भी व्यक्ति को केवल सामाजिक या राजनीतिक प्रभाव के कारण अनुचित लाभ नहीं मिलना चाहिए।
इसी तरह किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर अपराधी मान लेना भी न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
पुलिस के सामने दोहरी जिम्मेदारी है—
अपराधी को कानून के दायरे में लाना और निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाना।
यही निष्पक्ष पुलिसिंग की वास्तविक कसौटी है।
प्रभावशाली व्यक्ति और आम नागरिक के बीच अंतर क्यों?
कानून की नजर में सभी नागरिक समान होने चाहिए।
लेकिन जब किसी प्रभावशाली व्यक्ति के विरुद्ध शिकायत सामने आती है, तब पुलिस की निष्पक्षता की सबसे कठिन परीक्षा होती है।
क्या शिकायतकर्ता की सामाजिक स्थिति देखी जाएगी?
क्या आरोपी का राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक प्रभाव जांच की दिशा बदल सकता है?
क्या किसी दबाव के कारण कार्रवाई धीमी हो सकती है?
यदि नागरिक के मन में ऐसे सवाल पैदा होने लगें, तो पुलिस की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
पुलिस की ताकत केवल उसके पास मौजूद कानूनी अधिकारों में नहीं है। उसकी वास्तविक ताकत इस विश्वास में है कि कानून सभी के लिए समान है।
पुलिस पर दबाव भी एक वास्तविक समस्या है
पुलिस व्यवस्था की आलोचना करते समय यह भी समझना होगा कि पुलिसकर्मी स्वयं अनेक प्रकार के दबावों में काम करते हैं।
लंबे कार्य घंटे, सीमित संसाधन, लगातार बढ़ती जिम्मेदारियां, वीआईपी ड्यूटी, कानून-व्यवस्था की चुनौती, जांच का दबाव और राजनीतिक तथा प्रशासनिक अपेक्षाएं—ये सभी पुलिस के काम को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मी को दोषी ठहराकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।
यदि व्यवस्था में सुधार चाहिए तो पुलिसकर्मी को भी पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, उचित कार्य परिस्थितियां और पेशेवर स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
जवाबदेही जरूरी है, लेकिन जवाबदेही के साथ संस्थागत समर्थन भी जरूरी है।
पुलिस मुख्यालय की भूमिका क्या है?
पुलिस व्यवस्था केवल थाना स्तर पर समाप्त नहीं होती। थाना, क्षेत्राधिकारी, जिला पुलिस नेतृत्व, रेंज स्तर और पुलिस मुख्यालय—सभी एक ही व्यवस्था के हिस्से हैं।
यदि किसी थाने में लगातार शिकायतें आती हैं, यदि किसी क्षेत्र में अपराध का पैटर्न बार-बार सामने आता है, यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध लगातार गंभीर शिकायतें मिलती हैं या यदि जांच में बार-बार लापरवाही के आरोप लगते हैं, तो वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि केवल थाना प्रभारी ने क्या किया।
प्रश्न यह भी होना चाहिए—
वरिष्ठ अधिकारियों ने क्या देखा?
उन्होंने क्या समीक्षा की?
क्या शिकायतों का रिकॉर्ड देखा गया?
क्या बार-बार होने वाली घटनाओं का विश्लेषण किया गया?
और क्या समय रहते सुधारात्मक कार्रवाई की गई?
यही संस्थागत जवाबदेही है।
अपराध रोकने के लिए केवल गश्त पर्याप्त नहीं
अपराध-निवारण का अर्थ केवल सड़क पर पुलिस वाहन चलाना या रात में गश्त करना नहीं है।
आधुनिक पुलिसिंग में स्थानीय खुफिया जानकारी, समुदाय से संपर्क, अपराध के पैटर्न का विश्लेषण, संवेदनशील स्थानों की पहचान, तकनीक का उपयोग और नागरिकों के साथ नियमित संवाद भी महत्वपूर्ण हैं।
बीट अधिकारी यदि स्थानीय नागरिकों के साथ भरोसे का संबंध बनाए तो छोटी-सी सूचना भी किसी बड़े अपराध को रोकने में मदद कर सकती है।
लेकिन इसके लिए नागरिक को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी दी गई सूचना का गलत इस्तेमाल नहीं होगा और शिकायत करने के कारण उसे ही परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
पुलिस और जनता के बीच विश्वास कैसे बने?
विश्वास आदेश से नहीं बनता।
विश्वास व्यवहार से बनता है।
जब पुलिस शिकायतकर्ता की बात धैर्य से सुनती है, कानून के अनुसार कार्रवाई करती है, जांच में पारदर्शिता रखती है और आरोपी तथा पीड़ित के बीच बिना पूर्वाग्रह के कानून लागू करती है, तब विश्वास मजबूत होता है।
इसके विपरीत, जब नागरिक को लगता है कि उसकी शिकायत सुनी नहीं जा रही, तो वह पुलिस से दूरी बनाने लगता है।
और पुलिस तथा जनता के बीच दूरी बढ़ना अपराध-निवारण के लिए भी नुकसानदायक है।
क्या हर अपराध पुलिस की विफलता है?
इस प्रश्न का उत्तर भी स्पष्ट होना चाहिए—नहीं।
हर अपराध को पुलिस की विफलता कहना उचित नहीं होगा।
पुलिस हर अपराध को पहले से नहीं रोक सकती। समाज में अपराध के अनेक कारण होते हैं और अपराधी अपनी योजना छिपाकर भी अपराध कर सकता है।
लेकिन यदि किसी अपराध के संबंध में पुलिस को पहले से विश्वसनीय सूचना थी, लगातार शिकायतें थीं, संभावित खतरे की जानकारी थी और इसके बावजूद कोई उचित कदम नहीं उठाया गया, तो उस स्थिति में पुलिस की भूमिका और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यही अंतर समझना आवश्यक है।
अपराध होना और अपराध को रोकने में लापरवाही होना—दो अलग-अलग बातें हैं।
सुधार की शुरुआत कहां से हो?
पुलिस व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए केवल नए कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
जरूरत है कि मौजूदा व्यवस्थाओं का ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाए।
बीट पुलिसिंग को वास्तविक रूप से मजबूत किया जाए। थानों में शिकायतों की निगरानी हो। संवेदनशील मामलों की वरिष्ठ स्तर पर समीक्षा हो। जांच अधिकारियों को आधुनिक प्रशिक्षण मिले। तकनीकी संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो। पुलिसकर्मियों के काम के दबाव को समझते हुए पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध कराया जाए।
साथ ही, शिकायतकर्ता और पुलिस के बीच संवाद की व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
जहां पुलिसकर्मी अच्छा काम कर रहे हैं, वहां उन्हें प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
जहां लापरवाही हो रही है, वहां निष्पक्ष जांच और कार्रवाई भी होनी चाहिए।
न पुरस्कार बिना जवाबदेही के सार्थक है, न जवाबदेही बिना संस्थागत सुधार के।
आखिर जिम्मेदार कौन?
इस पूरे विमर्श का सबसे सरल उत्तर शायद यही है—
अपराध के लिए अपराधी जिम्मेदार है, लेकिन अपराध रोकने में व्यवस्था की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
पुलिस अपराध की जननी नहीं है, लेकिन अपराध-निवारण की महत्वपूर्ण संस्था जरूर है।
पुलिस हर अपराध रोक नहीं सकती, लेकिन हर शिकायत को गंभीरता से लेने की कोशिश जरूर कर सकती है।
पुलिस हर अपराधी को पहले से नहीं पहचान सकती, लेकिन अपने क्षेत्र में अपराध के संकेतों को समझने की क्षमता जरूर विकसित कर सकती है।
और सबसे महत्वपूर्ण—
पुलिस नागरिक की आवाज को समस्या नहीं, सूचना और सहयोग का स्रोत माने।
लोकतंत्र में कानून का शासन तभी मजबूत होता है जब नागरिक को यह विश्वास हो कि शिकायत करने पर उसे सुना जाएगा, अपराध की निष्पक्ष जांच होगी और कानून व्यक्ति की हैसियत देखकर नहीं बदलेगा।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि—
“अपराध क्यों हुआ?”
सवाल यह भी होना चाहिए—
“क्या उसे रोका जा सकता था?”
“क्या सूचना मिलने के बाद कार्रवाई हुई?”
“क्या पीड़ित की आवाज सुनी गई?”
“क्या जांच निष्पक्ष हुई?”
और अंततः—
“क्या व्यवस्था ने अपनी जिम्मेदारी निभाई?”
क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत केवल अपराधियों को पकड़ने में नहीं, बल्कि नागरिकों को यह भरोसा देने में है कि कानून उनके साथ खड़ा है।
यही पुलिस व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा है और यही उसका सबसे बड़ा आत्ममंथन भी।

