पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में 9 नए जज, 2027 के पंजाब चुनाव से पहले उठे सवाल
नई दिल्ली/चंडीगढ़, 20 अगस्त 2026।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में नौ अधिवक्ताओं को अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किए जाने की घोषणा के बाद कानूनी जगत के साथ-साथ पंजाब की राजनीति में भी बहस तेज हो गई है। केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने 20 अगस्त को इन नियुक्तियों की जानकारी सार्वजनिक की। नियुक्त किए गए नौ अधिवक्ताओं में मोनिका छिब्बर शर्मा, हरमीत सिंह देओल, प्रवीन्द्र सिंह चौहान, राजेश गौर, पूजा चोपड़ा, सुनीश बिंदलिश, मिंदरजीत यादव, दिव्या शर्मा और रविन्दर मलिक शामिल हैं।
इन नियुक्तियों को लेकर सबसे बड़ा सवाल न्यायिक नियुक्ति की प्रक्रिया और उसमें केंद्र सरकार की भूमिका को लेकर उठ रहा है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन नियुक्तियों को सीधे तौर पर किसी राजनीतिक दल से जोड़ने के लिए ठोस प्रमाण की आवश्यकता होगी।
नौ नए न्यायाधीशों की नियुक्ति पर क्या है विवाद?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के लिए दस अधिवक्ताओं के नामों की सिफारिश की थी। यह सिफारिश 4 मई 2026 को की गई थी। इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से नौ नामों की नियुक्ति अधिसूचित की गई।
दसवीं सिफारिश में शामिल अधिवक्ता नवदीप सिंह का नाम 20 अगस्त को जारी नियुक्ति सूची में दिखाई नहीं दिया। उपलब्ध जानकारी में उनके नाम को लेकर अंतिम निर्णय के कारणों की स्पष्ट सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने व्यक्तिगत रूप से अपनी पसंद के आधार पर नौ न्यायाधीशों का चयन किया। न्यायिक नियुक्ति की प्रक्रिया में कॉलेजियम की सिफारिश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
हालांकि, इसके साथ यह सवाल जरूर उठता है कि कॉलेजियम की सिफारिश के बाद केंद्र सरकार की प्रक्रिया क्या रही और एक नाम नियुक्ति सूची से बाहर क्यों रहा?
क्या भाजपा या RSS से संबंध होने का कोई प्रमाण है?
नियुक्त किए गए कुछ अधिवक्ताओं को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में भाजपा अथवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से वैचारिक निकटता के दावे किए जा रहे हैं।
लेकिन केवल राजनीतिक चर्चाओं या सोशल मीडिया दावों के आधार पर किसी न्यायाधीश को भाजपा या RSS से जुड़ा हुआ बताना उचित नहीं होगा। उपलब्ध विश्वसनीय जानकारी से यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है कि सभी नौ नियुक्त अधिवक्ताओं की किसी राजनीतिक संगठन से संबद्धता रही है या उनकी नियुक्ति किसी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर की गई।
इसलिए इस मुद्दे पर आरोप लगाने के बजाय दस्तावेजी प्रमाण और सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर जांच की जरूरत है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता का सवाल हालांकि अलग है। नियुक्त किए गए प्रत्येक व्यक्ति की पेशेवर पृष्ठभूमि, पूर्व सरकारी जिम्मेदारियां, महत्वपूर्ण सार्वजनिक पद, राजनीतिक गतिविधियां और सरकार या राजनीतिक दलों की ओर से किए गए प्रमुख विधिक प्रतिनिधित्व की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना न्यायिक व्यवस्था में भरोसा बढ़ाने में मदद कर सकता है।
प्रवीन्द्र सिंह चौहान की पृष्ठभूमि क्यों चर्चा में है?
नवनियुक्त अतिरिक्त न्यायाधीशों में प्रवीन्द्र सिंह चौहान का नाम विशेष रूप से चर्चा में है। वह हरियाणा सरकार के महाधिवक्ता के पद पर रह चुके हैं।
इसके अलावा मीडिया रिपोर्टों में राजेश गौर और मिंदरजीत यादव के हरियाणा सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता के रूप में कार्य करने तथा हरमीत सिंह देओल के पंजाब सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता के रूप में जुड़े होने का उल्लेख किया गया है।
सरकार की ओर से अदालत में पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ताओं का बाद में न्यायाधीश बनना अपने आप में किसी गलत प्रक्रिया का प्रमाण नहीं है। ऐसे अधिवक्ताओं की पेशेवर योग्यता और न्यायिक नियुक्ति की पात्रता का मूल्यांकन निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाता है।
फिर भी सार्वजनिक विमर्श में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जिन लोगों ने पहले सरकार का पक्ष अदालत में रखा है, उनके न्यायाधीश बनने के बाद संभावित हित-संघर्ष की स्थिति से निपटने के लिए क्या पर्याप्त संस्थागत व्यवस्था मौजूद है।
यह किसी व्यक्ति पर आरोप नहीं, बल्कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और जनता के विश्वास से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।
2027 का पंजाब चुनाव भी क्यों आया चर्चा में?
पंजाब में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। राजनीतिक दलों ने चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं और राज्य की राजनीति में विभिन्न मुद्दों को लेकर सक्रियता बढ़ रही है।
इसी राजनीतिक माहौल में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में नौ अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति ने राजनीतिक चर्चा को और बढ़ा दिया है।
हालांकि, केवल इस तथ्य से कि नियुक्तियां 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हुई हैं, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इनका उद्देश्य चुनाव को प्रभावित करना है।
किसी न्यायिक नियुक्ति को चुनावी रणनीति से जोड़ने के लिए ठोस प्रमाण की आवश्यकता होगी। न्यायिक नियुक्तियों और राजनीतिक घटनाक्रम के बीच केवल समय-साम्य अपने आप में कारण और परिणाम का प्रमाण नहीं होता।
असली सवाल नियुक्ति नहीं, पारदर्शिता का है
न्यायपालिका लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभों में से एक है। इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और संस्थागत भरोसा बेहद महत्वपूर्ण है।
इस पूरे मामले में जनता के सामने कुछ सवाल स्पष्ट रूप से रखे जा सकते हैं—
- कॉलेजियम ने दस नामों की सिफारिश किन आधारों पर की?
- नौ नामों को नियुक्त करने और एक नाम को रोकने के पीछे क्या कारण रहे?
- क्या केंद्र सरकार और कॉलेजियम के बीच इस संबंध में कोई अतिरिक्त पत्राचार हुआ?
- नियुक्त किए गए अधिवक्ताओं की पेशेवर और सार्वजनिक पृष्ठभूमि क्या है?
- पूर्व सरकारी विधिक पदों पर रहे उम्मीदवारों से जुड़े संभावित हित-संघर्ष के लिए क्या व्यवस्था है?
- क्या नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित पर्याप्त जानकारी सार्वजनिक की जाएगी?
इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि न्यायपालिका में जनता के विश्वास को मजबूत करने के लिए जरूरी है।
क्या नियुक्तियों पर राजनीति की छाया है?
इस सवाल का फिलहाल निश्चित उत्तर देना उचित नहीं होगा।
एक तरफ नियुक्तियों की प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश शामिल है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार द्वारा अंतिम नियुक्ति अधिसूचित की जाती है। इसलिए पूरी प्रक्रिया को समझे बिना किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल को नियुक्तियों के लिए जिम्मेदार ठहराना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
इसी तरह 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव और इन नियुक्तियों के बीच किसी सीधा राजनीतिक संबंध का प्रमाण भी सामने नहीं है।
लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना और प्रक्रिया की पारदर्शिता की मांग करना पूरी तरह जायज है।
निष्कर्ष
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में नौ नए अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय न्यायिक नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया के संदर्भ में समझने की जरूरत है।
यदि कॉलेजियम की सिफारिश, केंद्र सरकार की प्रक्रिया और नियुक्त किए गए सभी अधिवक्ताओं की पेशेवर पृष्ठभूमि से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट की जाती है, तो इससे विवाद और अटकलों दोनों को कम किया जा सकता है।
फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन नियुक्तियों पर राजनीति का प्रभाव पड़ा है। लेकिन यह पूछना जरूर उचित है कि नौ नाम क्यों मंजूर हुए, एक नाम क्यों रुका और नियुक्ति प्रक्रिया में केंद्र तथा कॉलेजियम की भूमिका कितनी पारदर्शी रही?
यही वे सवाल हैं जिनके जवाब आने वाले समय में इस पूरे विवाद की दिशा तय करेंगे।

