साल 2015 में मध्य-पूर्व की राजनीति में मोहम्मद बिन सलमान यानी MBS का नाम तेजी से उभर रहा था। उस समय उनकी उम्र करीब 29 साल थी और सऊदी अरब में सत्ता के केंद्र में उनकी भूमिका लगातार मजबूत हो रही थी। इसी दौर में यमन का युद्ध शुरू हुआ, जिसने अगले कई वर्षों तक सऊदी अरब की विदेश और सुरक्षा नीति को प्रभावित किया।
यमन में हूती विद्रोहियों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए सऊदी अरब के नेतृत्व में सैन्य गठबंधन ने हस्तक्षेप किया। लेकिन करीब एक दशक बाद भी यमन संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। 2026 में हूती गतिविधियों और लाल सागर में बढ़ते तनाव ने सऊदी अरब के सामने एक बार फिर सुरक्षा और आर्थिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
2015 में कैसे शुरू हुआ यमन युद्ध?
यमन में हूती लड़ाकों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था और राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी को देश छोड़ना पड़ा। इसके बाद सऊदी अरब ने यमन में सैन्य हस्तक्षेप किया। उस समय सऊदी नेतृत्व का उद्देश्य हूतियों के प्रभाव को सीमित करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को समर्थन देना था।
मोहम्मद बिन सलमान उस समय सऊदी रक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। यमन अभियान को सऊदी अरब की क्षेत्रीय शक्ति और सुरक्षा नीति के बड़े हिस्से के तौर पर देखा गया।
युद्ध लंबा खिंचा, लेकिन हूती खत्म नहीं हुए
सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य अभियान के बावजूद हूती संगठन यमन के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहा। संघर्ष ने यमन में गंभीर मानवीय संकट पैदा किया और लंबे समय तक जारी लड़ाई ने क्षेत्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया।
2022 में सऊदी अरब और हूतियों के बीच संघर्षविराम के बाद स्थिति में कुछ समय के लिए तनाव कम हुआ। सऊदी अरब ने इसके बाद यमन में नए सिरे से व्यापक युद्ध में लौटने से बचने की कोशिश की।
अब फिर क्यों बढ़ी चिंता?
2026 में मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष के बीच यमन में भी तनाव दोबारा बढ़ा है। रॉयटर्स के अनुसार, हूती और यमनी सरकार के समर्थन वाली सेनाओं ने मोर्चों पर अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है। संयुक्त राष्ट्र और ओमान की मध्यस्थता से तनाव कम करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन बातचीत के जरिए समाधान को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
सितंबर 2026 में सऊदी अरब के खिलाफ हूती हमलों और लाल सागर क्षेत्र में गतिविधियों ने स्थिति को और गंभीर बनाया। रॉयटर्स के मुताबिक, हूतियों की गतिविधियों से सऊदी तेल निर्यात के वैकल्पिक समुद्री मार्गों पर भी खतरा बढ़ा है।
लाल सागर और तेल कारोबार पर असर
यमन की भौगोलिक स्थिति सऊदी अरब के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। बाब-अल-मंदब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए महत्वपूर्ण मार्ग है।
सऊदी अरब ने पिछले वर्षों में अपनी तेल आपूर्ति के लिए लाल सागर के रास्तों और ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को भी रणनीतिक महत्व दिया है। सितंबर 2026 में इस पाइपलाइन पर हमले के बाद इसके संचालन में व्यवधान आया। रॉयटर्स के अनुसार, पाइपलाइन के जरिए प्रतिदिन करीब 40 लाख बैरल तेल तक लाल सागर के रास्ते भेजा जा सकता है, इसलिए लंबे समय तक व्यवधान वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर डाल सकता है।
MBS के Vision 2030 के लिए भी चुनौती
मोहम्मद बिन सलमान की प्रमुख आर्थिक योजना Vision 2030 है। इसका उद्देश्य सऊदी अर्थव्यवस्था को केवल तेल पर निर्भर रहने से बाहर निकालना और पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, निजी क्षेत्र तथा अन्य गैर-तेल क्षेत्रों को बढ़ावा देना है।
यमन और लाल सागर में लगातार अस्थिरता इस आर्थिक परिवर्तन के लिए भी चुनौती पैदा कर सकती है, क्योंकि समुद्री सुरक्षा, निवेश और क्षेत्रीय स्थिरता Vision 2030 से जुड़ी कई परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। IMF ने भी 2026 में कहा कि Vision 2030 ने सऊदी अर्थव्यवस्था में विविधीकरण और निजी क्षेत्र की भूमिका को आगे बढ़ाया है, हालांकि क्षेत्रीय युद्ध और समुद्री व्यवधान जोखिम बने हुए हैं।
UAE के साथ रिश्तों ने भी बदला समीकरण
यमन संकट के दौरान सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात दोनों ने अलग-अलग यमनी गुटों और हितों के साथ काम किया। समय के साथ दोनों देशों के क्षेत्रीय हितों में अंतर भी सामने आया। यमन की राजनीति में अलग-अलग स्थानीय शक्तियों को मिले समर्थन ने संघर्ष को और जटिल बनाया।
यही वजह है कि यमन का संकट केवल सऊदी अरब और हूतियों के बीच टकराव तक सीमित नहीं रहा। इसमें ईरान, UAE, अमेरिका और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के हित भी जुड़े हुए हैं।
जिस युद्ध से ताकत दिखानी थी, वही बना लंबा संकट
2015 में यमन में सैन्य हस्तक्षेप को सऊदी अरब की क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रभाव से जोड़कर देखा गया था। लेकिन एक दशक बाद भी हूती संगठन समाप्त नहीं हुआ है और 2026 में लाल सागर तथा सऊदी तेल ढांचे से जुड़े नए खतरे सामने आए हैं।
मौजूदा स्थिति में रियाद के सामने एक तरफ अपने तेल निर्यात और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा की चुनौती है, तो दूसरी तरफ यमन में फिर से बड़े पैमाने पर सैन्य संघर्ष में जाने से बचने का दबाव भी है। रॉयटर्स के अनुसार, सऊदी अरब ने 2022 के संघर्षविराम के बाद दोबारा व्यापक युद्ध से बचने की कोशिश की है, जबकि हालिया हमलों ने उस नीति की कठिन परीक्षा शुरू कर दी है।
इस तरह करीब एक दशक पुराने यमन युद्ध का असर आज भी सऊदी अरब की सुरक्षा, क्षेत्रीय कूटनीति और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं पर दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में यमन में तनाव कम होता है या फिर संघर्ष दोबारा व्यापक रूप लेता है, इसका असर केवल सऊदी अरब पर नहीं बल्कि लाल सागर के समुद्री व्यापार और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
रिपोर्टर; ध्रुव सिंह, मुख्य संवाददाता पंजाब
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द
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