राज्यसभा चुनाव में सपा ने क्यों नहीं उतारा तीसरा उम्मीदवार? अखिलेश यादव ने बताया 2027 का प्लान
लखनऊ: उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाले चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) ने तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है। इसके साथ ही राज्यसभा चुनाव को लेकर पिछले कई दिनों से चल रही सियासी अटकलों पर भी विराम लग गया है। सपा की ओर से पहले प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी ने नामांकन दाखिल किया था। तीसरे उम्मीदवार को लेकर पार्टी के भीतर लगातार मंथन चल रहा था, लेकिन नामांकन की समय सीमा खत्म होने तक सपा ने तीसरा प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा।
दरअसल, सपा ने राज्यसभा चुनाव के लिए चार नामांकन पत्र खरीदे थे। इसके बाद पार्टी के नेताओं की ओर से दावा किया जा रहा था कि सपा तीन उम्मीदवार मैदान में उतार सकती है। खुद अखिलेश यादव ने भी दोनों उम्मीदवारों के नामांकन के दौरान संकेत दिया था कि यदि जरूरी संख्या बल जुट गया तो तीसरे प्रत्याशी का ऐलान किया जा सकता है। इसी वजह से राजनीतिक गलियारों में सपा के संभावित ‘सरप्राइज उम्मीदवार’ को लेकर चर्चा तेज थी।
तीसरे उम्मीदवार के लिए चाहिए था मजबूत संख्या बल
राज्यसभा चुनाव में एक सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के आधार पर 37 विधायकों के वोट की जरूरत होती है। सपा के लिए दो सीटों पर जीत का गणित काफी हद तक सुरक्षित था, लेकिन तीसरी सीट के लिए उसे अतिरिक्त विधायकों का समर्थन जुटाना पड़ता। उपलब्ध विधानसभा संख्या और सहयोगी दलों के समीकरण को देखते हुए यह चुनौती आसान नहीं थी।
सपा की कोशिश थी कि विपक्षी और तटस्थ विधायकों के साथ-साथ ऐसे विधायक भी उसके साथ आ सकते हैं, जिन्होंने पिछले राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की थी। पार्टी को उम्मीद थी कि कुछ बागी विधायक दोबारा उसके साथ आ सकते हैं। हालांकि, बीजेपी प्रत्याशियों के नाम सामने आने के बाद सपा के लिए यह गणित और मुश्किल हो गया।
सुभासपा के अब्बास अंसारी की अखिलेश यादव से मुलाकात को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा गया था। लेकिन बीजेपी के सहयोगी दलों में किसी बड़े स्तर पर टूट के संकेत नहीं मिले। ऐसे में तीसरी सीट के लिए जरूरी संख्या जुटाना सपा के सामने बड़ी चुनौती बन गया।
क्रॉस वोटिंग का भी था खतरा
सपा के तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारने के फैसले के पीछे संख्या बल के साथ-साथ क्रॉस वोटिंग का जोखिम भी अहम माना जा रहा है। अगर पार्टी पर्याप्त संख्या के बिना तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारती और उसके पक्ष में जरूरी वोट नहीं आते, तो चुनावी मुकाबला उसके लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता था। ऐसे में पार्टी ने जोखिम लेने के बजाय अपने मौजूदा दो उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने को प्राथमिकता दी।
राजनीतिक विश्लेषण में यह भी माना जा रहा है कि अखिलेश यादव नहीं चाहते कि राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट के लिए पार्टी के भीतर किसी तरह का मतभेद या क्रॉस वोटिंग सामने आए। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन और विधायकों को एकजुट रखना सपा के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अखिलेश यादव का संदेश- तीन नहीं, 403 पर नजर
तीसरे उम्मीदवार को लेकर चल रही अटकलों के बीच अखिलेश यादव ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “अब हमारी निगाह तीन पर नहीं, चार सौ तीन पर है।” उनके इस बयान को साफ संकेत के तौर पर देखा गया कि सपा अब राज्यसभा की तीसरी सीट की लड़ाई से ज्यादा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर ध्यान केंद्रित करना चाहती है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। ऐसे में अखिलेश यादव का 403 का जिक्र सीधे तौर पर मिशन 2027 से जोड़कर देखा जा रहा है। सपा 2027 में बीजेपी के खिलाफ मजबूत राजनीतिक लड़ाई की तैयारी कर रही है और राज्यसभा चुनाव में अतिरिक्त सीट के लिए होने वाली जोड़-तोड़ से बचकर पार्टी का फोकस विधानसभा चुनाव पर रखना चाहती है।
बीजेपी के 8 और सपा के 2 उम्मीदवार
सपा के तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारने के बाद उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर बीजेपी के आठ और सपा के दो उम्मीदवार मैदान में हैं। सपा की ओर से प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी उम्मीदवार हैं।
वहीं बीजेपी ने धर्मपाल सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया है। बीजेपी के आठ उम्मीदवारों के साथ सपा के दो उम्मीदवार मिलाकर कुल 10 प्रत्याशी ही मैदान में हैं।
निर्विरोध चुनाव की संभावना
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए कुल 10 उम्मीदवारों के नामांकन के बाद अब चुनावी मुकाबले की स्थिति नहीं बनती दिख रही है। यदि नामांकन पत्रों की जांच में सभी पर्चे वैध पाए जाते हैं और कोई उम्मीदवार नाम वापस नहीं लेता है, तो बीजेपी के आठ और सपा के दो उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो सकते हैं। नामांकन प्रक्रिया 6 अक्टूबर को पूरी हुई, जबकि 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच और 9 अक्टूबर तक नाम वापसी की प्रक्रिया होनी है।
इस तरह सपा का तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला केवल राज्यसभा की एक सीट छोड़ने तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसके पीछे पार्टी के संख्या बल, क्रॉस वोटिंग के संभावित खतरे और सबसे बढ़कर 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीति को अहम वजह माना जा रहा है। अखिलेश यादव के 403 सीटों वाले बयान ने भी यह संकेत दे दिया है कि अब सपा की राजनीतिक प्राथमिकता राज्यसभा से ज्यादा उत्तर प्रदेश की सत्ता की लड़ाई है।
रिपोर्टर; ध्रुव सिंह, मुख्य संवाददाता पंजाब दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द
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