Barabanki Women Empowerment: स्वयं सहायता समूहों के सहारे आत्मनिर्भर बनीं तीन महिलाएं
बाराबंकी: उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में तीन महिलाओं ने मुश्किल हालात के आगे हार मानने के बजाय अपनी जिंदगी बदलने का फैसला किया। किसी को पति ने तीन बेटियों के साथ घर से निकाल दिया, तो किसी के सामने परिवार चलाने और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने की चुनौती थी। इन महिलाओं ने स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर आत्मनिर्भरता की राह चुनी।
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए चलाए जा रहे स्वयं सहायता समूह कई महिलाओं के लिए सहारा बन रहे हैं। इन समूहों के जरिए महिलाएं कर्ज लेकर छोटा कारोबार शुरू कर सकती हैं और अपनी आमदनी बढ़ाने की दिशा में कदम उठा सकती हैं। बाराबंकी की इन महिलाओं की कहानियां इसी बदलाव की मिसाल हैं।
सकीना बानो ने ई-रिक्शा चलाकर बदली जिंदगी
बाराबंकी के बंकी ब्लॉक की नूरपुर ग्राम पंचायत की निवासी सकीना बानो ने वर्ष 2021 में ख्वाजा स्वयं सहायता समूह से कर्ज लेकर अपना पहला ई-रिक्शा खरीदा। इस फैसले ने उनके लिए कमाई का नया रास्ता खोला।
ई-रिक्शा के जरिए उन्होंने अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश शुरू की। स्वयं सहायता समूह से मिली आर्थिक मदद ने उन्हें अपना काम शुरू करने का अवसर दिया। यह कदम उनके लिए सिर्फ कमाई का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने की दिशा में महत्वपूर्ण शुरुआत भी था।
सकीना बानो की कहानी बताती है कि सही समय पर मिलने वाली आर्थिक सहायता और खुद कुछ करने का हौसला किसी महिला की जिंदगी में बड़ा बदलाव ला सकता है।
सकीना बानो के मुताबिक, आज उनके पास दो ई-रिक्शा और एक कार है। इन तीनों वाहनों से उन्हें हर महीने करीब 25 से 30 हजार रुपये की कमाई होती है। इसी आमदनी से वह अपने परिवार का खर्च उठाने के साथ तीनों बेटियों की पढ़ाई और परवरिश भी कर रही हैं।
मोनी विश्वकर्मा ने फसल कटाई की मशीन से शुरू किया रोजगार
बाराबंकी के दाउदपुर गांव की निवासी मोनी विश्वकर्मा के परिवार की आर्थिक स्थिति पहले ठीक नहीं थी। उनके पति मजदूरी और वेल्डिंग का काम करते थे, लेकिन परिवार की जरूरतों को पूरा करना चुनौती बना हुआ था।
मोनी ने मां लक्ष्मी महिला स्वयं सहायता समूह बनाया और समूह से करीब डेढ़ लाख रुपये का कर्ज लेकर फसल काटने वाली मशीन खरीदी। इस मशीन से उनके परिवार को कमाई का नया साधन मिला। उनके पति खेतों में फसल कटाई का काम करते हैं और मशीन को जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल करके आमदनी अर्जित करते हैं।
मोनी के मुताबिक, फसल कटाई के काम से हर सीजन में करीब 30 से 35 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है। स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें आर्थिक मदद के साथ समाज में एक नई पहचान भी मिली है। अब वह दूसरी महिलाओं को भी रोजगार शुरू करने और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।
निशा यादव ने आटा और मसाला चक्की लगाकर बदली स्थिति
बाराबंकी के बंकी ब्लॉक की दाउदपुर ग्राम पंचायत की निवासी निशा यादव ने भी स्वयं सहायता समूह की मदद से अपना काम शुरू किया। उन्होंने शिव स्वयं महिला सहायता समूह से 50 हजार रुपये का कर्ज लेकर आटा और मसाला पीसने की चक्की लगाई।
अब गांव और आसपास के लोग उनके यहां मिर्च, हल्दी, धनिया और गेहूं पिसवाने आते हैं। निशा खुद मशीन चलाकर काम करती हैं। इस व्यवसाय से उन्हें हर महीने करीब 15 से 20 हजार रुपये तक की बचत होने की बात बताई गई है।
निशा का यह प्रयास दिखाता है कि गांव में उपलब्ध जरूरतों को समझकर छोटे स्तर पर भी कारोबार शुरू किया जा सकता है। इसके लिए बड़ी पूंजी के बजाय सही योजना, मेहनत और समय पर मिलने वाली आर्थिक सहायता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
स्वयं सहायता समूहों से महिलाओं को मिल रही नई पहचान
इन तीनों महिलाओं की कहानियों में स्वयं सहायता समूहों की अहम भूमिका सामने आती है। समूहों से जुड़ने पर महिलाओं को बचत करने, जरूरत के समय कर्ज लेने और स्वरोजगार शुरू करने का अवसर मिलता है। इससे वे परिवार की आय बढ़ाने में योगदान देने के साथ आर्थिक फैसलों में भी अधिक भागीदारी कर सकती हैं।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत ग्रामीण महिलाओं को समूहों से जोड़कर उन्हें रोजगार और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है। छोटे कारोबार, कृषि से जुड़े उपकरण और स्थानीय जरूरतों पर आधारित सेवाएं महिलाओं की कमाई का जरिया बन सकती हैं।
हजारों महिलाओं को लखपति बनाने का लक्ष्य
बाराबंकी के उपायुक्त सुनील कुमार कौशल के मुताबिक, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की योजनाओं के तहत हर साल हजारों महिलाओं को लखपति बनाने के लक्ष्य के साथ काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करना और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाना है।
स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाओं को स्वरोजगार शुरू करने का अवसर मिलने से वे केवल परिवार पर निर्भर रहने के बजाय खुद कमाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। हालांकि, ऐसे कारोबार को लंबे समय तक सफल बनाए रखने के लिए बाजार तक पहुंच, नियमित आमदनी, कर्ज चुकाने की क्षमता और जरूरी प्रशिक्षण भी महत्वपूर्ण हैं।
बाराबंकी की सकीना बानो, मोनी विश्वकर्मा और निशा यादव ने अपनी मेहनत से यह दिखाया है कि मुश्किल हालात के बावजूद नए रास्ते तलाशे जा सकते हैं। स्वयं सहायता समूह से मिली मदद को आधार बनाकर इन महिलाओं ने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने की कोशिश की है और दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बनी हैं।


