100 साल का इतिहास: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और भारत की राजनीति — राष्ट्र को क्या मिला, जनता ने क्या खोया और अब आगे क्या?
उपशीर्षक: 1925 से 2026 तक संघ परिवार का वैचारिक विस्तार, जनसंघ से भाजपा तक राजनीतिक सत्ता का सफर, सामाजिक योगदान, ऐतिहासिक विवाद, अर्थव्यवस्था, नागरिक अधिकार और संवैधानिक संस्थाओं पर प्रभाव की विशेष पड़ताल।
विशेष प्रस्तुति: दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द हिंदी समाचार पत्र एवं आरईएच हिंदी समाचार चैनल
रिपोर्ट: विशेष राजनीतिक एवं ऐतिहासिक विश्लेषण डेस्क, नई दिल्ली
नई दिल्ली, 22 अक्टूबर 2026। भारत के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक इतिहास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सौ वर्षों से अधिक की यात्रा एक महत्वपूर्ण अध्याय है। 27 सितंबर 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित इस संगठन ने एक शताब्दी के दौरान शाखाओं, स्वयंसेवकों, शैक्षणिक संस्थाओं, सामाजिक सेवा गतिविधियों और वैचारिक रूप से जुड़े संगठनों के माध्यम से व्यापक विस्तार किया। इसी वैचारिक परंपरा से जुड़े भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने देश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया।
वर्ष 2025 में संघ की स्थापना के सौ वर्ष पूरे हुए। अब 2026 में उसके ऐतिहासिक प्रभाव का मूल्यांकन केवल संगठन के विस्तार या भाजपा की चुनावी सफलताओं से नहीं, बल्कि भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, लोकतंत्र, धार्मिक सद्भाव और नागरिक अधिकारों पर पड़े प्रभावों से भी किया जाना चाहिए।
इस पूरे इतिहास के सामने तीन बड़े प्रश्न हैं—राष्ट्र को क्या मिला, जनता ने किन परिस्थितियों में नुकसान उठाया और आने वाले वर्षों में लोकतांत्रिक जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाए?
संघ की स्थापना और हिंदू राष्ट्रवाद की वैचारिक पृष्ठभूमि
1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई, उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। स्वतंत्रता आंदोलन में विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक विचारधाराएँ सक्रिय थीं। डॉ. हेडगेवार ने हिंदू समाज के संगठन, अनुशासन, शारीरिक प्रशिक्षण और सांस्कृतिक चेतना को संघ की गतिविधियों का आधार बनाया।
संघ के समर्थक इसे राष्ट्रीय चरित्र निर्माण और सामाजिक एकता का प्रयास मानते हैं। आलोचक हिंदू राष्ट्र की अवधारणा और भारत की बहुधार्मिक संवैधानिक पहचान के बीच संभावित टकराव का प्रश्न उठाते हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन में संघ की संस्थागत भूमिका पर भी इतिहासकारों के बीच मतभेद रहे हैं। संघ से जुड़े कुछ व्यक्तियों ने स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लिया, लेकिन संगठन के रूप में संघ ने कांग्रेस की तरह व्यापक ब्रिटिश-विरोधी जनांदोलनों का नेतृत्व नहीं किया।
गांधी हत्या, 1948 का प्रतिबंध और ऐतिहासिक विवाद
30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की। इसके बाद 4 फरवरी 1948 को भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया।
सरकार ने उस समय संगठन की गतिविधियों और सांप्रदायिक वातावरण को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि, गांधी हत्या के आपराधिक मुकदमे में संघ को एक संस्था के रूप में दोषी ठहराने वाला न्यायिक निर्णय नहीं हुआ।
जुलाई 1949 में संघ पर लगा प्रतिबंध हटा लिया गया। यह घटनाक्रम भारतीय राज्य और संघ के संबंधों में महत्वपूर्ण मोड़ बना।
जनसंघ से भाजपा तक: सत्ता की राजनीति में प्रवेश
1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। जनसंघ के संगठनात्मक विकास में संघ की पृष्ठभूमि वाले कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1975 में आपातकाल लागू होने के बाद संघ सहित अनेक संगठनों पर प्रतिबंध लगा। नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियों के विरुद्ध संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भी गतिविधियों में भाग लिया।
1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद जनसंघ की राजनीतिक धारा उसमें शामिल हुई। बाद में दोहरी सदस्यता और संघ से संबंधों को लेकर विवाद उत्पन्न हुए।
6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने।
राम जन्मभूमि आंदोलन और सांप्रदायिक सद्भाव की चुनौती
1980 और 1990 के दशकों में राम जन्मभूमि आंदोलन भारतीय राजनीति का निर्णायक मुद्दा बना। विश्व हिंदू परिषद, भाजपा और अन्य संगठनों ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग को व्यापक अभियान का स्वरूप दिया।
1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा ने आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का ढाँचा गिरा दिया गया। इसके बाद देश के अनेक हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा हुई और बड़ी संख्या में नागरिकों की मृत्यु हुई।
2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या भूमि विवाद का फैसला सुनाया। न्यायालय ने विवादित भूमि मंदिर निर्माण के लिए देने और मस्जिद के लिए अलग भूमि उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। साथ ही मस्जिद के विध्वंस को कानून के शासन का गंभीर उल्लंघन माना।
यह आंदोलन भाजपा के राजनीतिक विस्तार में महत्वपूर्ण रहा, लेकिन इससे जुड़े घटनाक्रम ने धार्मिक ध्रुवीकरण और सामाजिक विश्वास पर गंभीर प्रश्न भी खड़े किए।
वाजपेयी सरकार, गुजरात दंगे और राजनीतिक परिवर्तन
1998 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने राजमार्ग निर्माण, दूरसंचार सुधार और आर्थिक विकास की अनेक नीतियों को आगे बढ़ाया।
इसी अवधि में 2002 में गुजरात के गोधरा ट्रेन अग्निकांड के बाद व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई। इसमें बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई और अनेक परिवार विस्थापित हुए।
तत्कालीन राज्य सरकार की प्रशासनिक भूमिका पर गंभीर सवाल उठे। विभिन्न मामलों में न्यायिक कार्यवाही हुई। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध व्यापक आपराधिक साजिश से जुड़े आरोप संबंधित न्यायिक प्रक्रिया में स्थापित नहीं हुए।
फिर भी हिंसा के पीड़ितों के न्याय, पुनर्वास और सुरक्षा से जुड़े प्रश्न भारतीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण बने रहे।
2014 से 2026: भाजपा की राष्ट्रीय सत्ता और नीतियों का प्रभाव
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। 2019 में पार्टी को दोबारा बहुमत मिला।
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन अकेले बहुमत से पीछे रही। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने सरकार बनाई और नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने।
इस अवधि में जनधन योजना, स्वच्छ भारत अभियान, डिजिटल इंडिया, उज्ज्वला योजना, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, सड़क निर्माण और रेलवे आधुनिकीकरण जैसे कार्यक्रमों को प्रमुखता मिली।
इन योजनाओं से बैंकिंग सेवाओं, डिजिटल भुगतान और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ।
दूसरी ओर, बेरोजगारी, महँगाई, आय असमानता, छोटे कारोबारों की चुनौतियों, सामाजिक ध्रुवीकरण और संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर भी गंभीर बहस हुई।
इन उपलब्धियों और समस्याओं का निष्पक्ष मूल्यांकन स्वतंत्र आँकड़ों और वास्तविक नीतिगत परिणामों से किया जाना चाहिए।
शिक्षा, सामाजिक सेवा और सांस्कृतिक प्रभाव
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से वैचारिक रूप से जुड़े विभिन्न संगठनों ने शिक्षा, छात्र राजनीति, श्रमिक गतिविधियों और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में अपना विस्तार किया।
विद्या भारती, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों की अपनी अलग-अलग गतिविधियाँ और संरचनाएँ हैं।
इनके समर्थक शिक्षा, अनुशासन, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक सेवा में योगदान का उल्लेख करते हैं। आलोचक शिक्षा के वैचारिक स्वरूप, इतिहास की प्रस्तुति और धार्मिक विविधता के प्रति दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हैं।
किसी भी शिक्षण संस्था का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वह विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, स्वतंत्र चिंतन और संवैधानिक मूल्यों को कितना मजबूत करती है।
धार्मिक सद्भाव और नागरिक अधिकारों का प्रश्न
भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समान संरक्षण प्रदान करता है।
संघ की हिंदू राष्ट्र संबंधी अवधारणा को उसके समर्थक सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं, जबकि आलोचक इसके राजनीतिक प्रयोग से धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और समान नागरिकता पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं।
धर्मांतरण, गोहत्या, अंतरधार्मिक विवाह और धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों ने विभिन्न समयों पर सामाजिक तनाव पैदा किया है।
लेकिन किसी भी हिंसक घटना में व्यक्तिगत या संगठनात्मक जिम्मेदारी निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र जाँच और प्रमाण आवश्यक हैं।
चुनावी बॉन्ड और राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता
15 फरवरी 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित किया।
न्यायालय ने राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे की जानकारी सार्वजनिक न होने को नागरिकों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन माना। असीमित कॉरपोरेट राजनीतिक चंदे की अनुमति देने वाले कानूनी बदलावों को भी असंवैधानिक पाया गया।
सार्वजनिक हुए आँकड़ों में भाजपा चुनावी बॉन्ड के माध्यम से सबसे अधिक चंदा प्राप्त करने वाली राजनीतिक पार्टी रही।
हालांकि, किसी राजनीतिक दल को चंदा मिलने से अपने आप भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं होता। किसी विशेष चंदे के बदले अनुचित लाभ दिए जाने का आरोप स्थापित करने के लिए स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक हैं।
इस मामले ने भारत में चुनावी वित्तपोषण, कॉरपोरेट प्रभाव और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किए।
आर्थिक विकास और आम नागरिकों की कठिनाइयाँ
भाजपा नेतृत्व वाली सरकारों के दौरान बैंकिंग सेवाओं, डिजिटल भुगतान, सड़क निर्माण, रेलवे आधुनिकीकरण और सरकारी योजनाओं के प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण में विस्तार हुआ।
इन कार्यक्रमों से अनेक नागरिकों को सुविधाएँ मिलीं।
दूसरी ओर, 2016 की नोटबंदी, जीएसटी के शुरुआती क्रियान्वयन, बेरोजगारी, महँगाई और आय असमानता जैसे मुद्दों पर गंभीर बहस हुई।
नोटबंदी के दौरान नकदी पर निर्भर छोटे कारोबारियों और असंगठित क्षेत्र को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जीएसटी के शुरुआती वर्षों में भी अनेक छोटे व्यवसायों ने अनुपालन संबंधी समस्याएँ बताईं।
आर्थिक विकास की वास्तविक सफलता का मूल्यांकन नागरिकों की आय, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर में सुधार से किया जाना चाहिए।
संवैधानिक संस्थाएँ और लोकतांत्रिक जवाबदेही
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था न्यायपालिका, चुनाव आयोग, संसद, प्रशासन और स्वतंत्र मीडिया जैसी संस्थाओं पर आधारित है।
भाजपा के केंद्रीय शासन के दौरान विपक्षी दलों ने जाँच एजेंसियों के इस्तेमाल, संस्थागत नियुक्तियों और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए हैं।
सरकार ने विभिन्न आरोपों का विरोध करते हुए अपनी कार्रवाइयों को कानून के अनुरूप बताया है।
इन विवादों का निष्पक्ष मूल्यांकन संबंधित दस्तावेजों, न्यायालयों के निर्णयों और संस्थागत प्रक्रियाओं के आधार पर होना चाहिए।
संघ और भाजपा के बीच ऐतिहासिक तथा वैचारिक संबंध स्थापित हैं, लेकिन इससे यह स्वतः प्रमाणित नहीं होता कि प्रत्येक संवैधानिक संस्था संघ के प्रत्यक्ष नियंत्रण में है।
सौ वर्षों में भारत को क्या मिला और जनता ने क्या खोया?
संघ और उससे जुड़े संगठनों के समर्थक सामाजिक सेवा, शिक्षा, स्वयंसेवक प्रशिक्षण, आपदा राहत और संगठनात्मक क्षमता को प्रमुख योगदान मानते हैं।
भाजपा सरकारों के दौरान बुनियादी ढाँचे, डिजिटल सेवाओं और वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में हुई प्रगति भी मूल्यांकन का महत्वपूर्ण विषय है।
दूसरी ओर, सांप्रदायिक हिंसा में नागरिकों की जान-माल की हानि, आर्थिक नीतियों से उत्पन्न कठिनाइयाँ, राजनीतिक वित्तपोषण में अपारदर्शिता और सामाजिक ध्रुवीकरण से जुड़ी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि, इन सभी घटनाओं और परिणामों को सीधे किसी एक संगठन की गतिविधियों का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। प्रत्येक घटना और नीति में जिम्मेदारी अलग-अलग प्रमाणों से तय की जानी चाहिए।
अब आगे क्या? भारत के लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा सवाल
सौ वर्षों के इतिहास का मूल्यांकन करते समय भारत के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता और सुरक्षा का है।
क्या सभी धर्मों और समुदायों के नागरिकों को समान न्याय मिल रहा है? क्या युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार उपलब्ध हो रहा है? क्या राजनीतिक दलों की आर्थिक व्यवस्था पारदर्शी है? क्या संवैधानिक संस्थाएँ स्वतंत्र रूप से काम कर रही हैं? क्या देश की धार्मिक और सामाजिक विविधता को राष्ट्रीय शक्ति के रूप में देखा जा रहा है?
इन प्रश्नों के उत्तर राजनीतिक भाषणों के बजाय प्रमाणित आँकड़ों, सार्वजनिक नीतियों और नागरिकों के वास्तविक अनुभवों से मिलने चाहिए।
निष्कर्ष: संविधान से बड़ा कोई संगठन नहीं, जनता के अधिकार सर्वोपरि
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 1925 से 2026 तक की यात्रा भारतीय राजनीति, सामाजिक संगठन और वैचारिक परिवर्तन की महत्वपूर्ण कहानी है।
इस दौरान संघ और उससे जुड़े संगठनों ने विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में कार्य किया। भारतीय जनसंघ और भाजपा के माध्यम से इस वैचारिक परंपरा ने राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।
इस इतिहास में उपलब्धियाँ भी हैं, विवाद भी हैं और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़े गंभीर प्रश्न भी हैं।
किसी संगठन के योगदान को स्वीकार करना उसकी आलोचना का अधिकार समाप्त नहीं करता। इसी प्रकार किसी विचारधारा से असहमति बिना प्रमाण किसी संगठन को अपराधी घोषित करने का आधार नहीं हो सकती।
भारत की वास्तविक शक्ति किसी एक राजनीतिक दल, संगठन या नेता में नहीं, बल्कि संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिकों की समान स्वतंत्रता में निहित है।
सौ वर्षों की इस ऐतिहासिक यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि प्रत्येक संगठन और सरकार का मूल्यांकन उसके कार्यों, सार्वजनिक प्रभाव और संविधान के प्रति आचरण के आधार पर होना चाहिए।
विशेष रिपोर्ट: दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द हिंदी समाचार पत्र एवं आरईएच हिंदी समाचार चैनल
रिपोर्ट: विशेष राजनीतिक एवं ऐतिहासिक विश्लेषण डेस्क, नई दिल्ली

