Connaught Place History: कभी गांव और जंगल हुआ करते थे दिल्ली के सेंट्रल पार्क की जगह, जानिए कैसे बना राजधानी का मशहूर स्थल
नई दिल्ली: दिल्ली के कनॉट प्लेस की सफेद इमारतें और उनके बीच स्थित सेंट्रल पार्क राजधानी की पहचान बन चुके हैं। यहां हरियाली के बीच लहराता तिरंगा लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस जगह आज सेंट्रल पार्क दिखाई देता है, वहां कभी गांव और पेड़-पौधों से घिरे इलाके हुआ करते थे? समय के साथ इस जमीन का स्वरूप बदला और यह दिल्ली के सबसे चर्चित सार्वजनिक स्थलों में शामिल हो गई।
सेंट्रल पार्क का इतिहास केवल एक पार्क के निर्माण की कहानी नहीं है, बल्कि दिल्ली के विस्तार, नई राजधानी के विकास और आधुनिक शहरी ढांचे के निर्माण से भी जुड़ा है।
कभी गांव और हरियाली से घिरा था यह इलाका
आज कनॉट प्लेस दिल्ली का प्रमुख व्यावसायिक और पर्यटन केंद्र है। यहां बड़ी संख्या में दुकानें, रेस्तरां, कार्यालय और ऐतिहासिक इमारतें मौजूद हैं। हालांकि, 20वीं सदी की शुरुआत में इस क्षेत्र का स्वरूप आज जैसा नहीं था।
नई दिल्ली के विकास से पहले यहां गांव और हरियाली वाले इलाके मौजूद थे। कनॉट प्लेस और उसके आसपास की जमीन के इस्तेमाल में बदलाव ब्रिटिश शासन के दौरान राजधानी के विस्तार की योजनाओं के साथ आया।
1912 में दिल्ली के विस्तार की योजना
वर्ष 1911 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की थी। इसके बाद नई राजधानी के निर्माण और शहरी विस्तार की योजनाओं पर काम शुरू हुआ।
वर्ष 1912 के आसपास दिल्ली के विस्तार की प्रक्रिया आगे बढ़ी। नई राजधानी के लिए जमीन की जरूरत थी, इसलिए आसपास के कई गांवों की जमीन अधिग्रहित की गई। कनॉट प्लेस के आसपास का इलाका भी इसी व्यापक शहरी बदलाव का हिस्सा बना।
इस जमीन के स्वामित्व और अधिग्रहण से जुड़े इतिहास में जयपुर के तत्कालीन शासकों का उल्लेख मिलता है। समय के साथ इस क्षेत्र को योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया गया और आगे चलकर कनॉट प्लेस दिल्ली के प्रमुख व्यावसायिक केंद्र के रूप में स्थापित हुआ।
कैसे बना कनॉट प्लेस?
कनॉट प्लेस का निर्माण ब्रिटिश काल में नई दिल्ली की शहरी योजना के तहत किया गया। इसकी गोलाकार संरचना, सफेद स्तंभों वाली इमारतें और व्यवस्थित बाजार इसे दूसरे व्यावसायिक इलाकों से अलग पहचान देते हैं।
इस क्षेत्र का नाम ब्रिटिश शाही परिवार के सदस्य प्रिंस आर्थर, ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर रखा गया था। समय के साथ यहां कारोबार बढ़ा और यह दिल्ली के प्रमुख बाजारों में शामिल हो गया।
कनॉट प्लेस की वास्तुकला आज भी औपनिवेशिक दौर की शहरी योजना की झलक दिखाती है। इसके आसपास विकसित सार्वजनिक स्थानों ने भी इसे राजधानी के प्रमुख आकर्षणों में शामिल करने में भूमिका निभाई।
मेट्रो निर्माण के बाद विकसित हुआ सेंट्रल पार्क
कनॉट प्लेस के बीच स्थित सेंट्रल पार्क का मौजूदा स्वरूप दिल्ली मेट्रो के विकास से भी जुड़ा है। वर्ष 2001 में मेट्रो परियोजना के काम के लिए इस क्षेत्र में निर्माण गतिविधियां हुईं। भूमिगत मेट्रो ढांचे के विकास के बाद ऊपर की जगह को सार्वजनिक पार्क के रूप में विकसित किया गया।
इस तरह व्यस्त बाजार और परिवहन केंद्र के बीच लोगों के लिए एक खुला हरित स्थान तैयार हुआ। आज यह पार्क स्थानीय लोगों और दिल्ली घूमने आने वाले पर्यटकों के लिए आराम करने और सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होने का प्रमुख स्थल है।
सेंट्रल पार्क में लहराता है विशाल तिरंगा
सेंट्रल पार्क की पहचान यहां स्थापित विशाल राष्ट्रीय ध्वज से भी है। तिरंगे के कारण यह स्थान देशभक्ति से जुड़े आयोजनों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए भी महत्वपूर्ण बन गया है।
कनॉट प्लेस की व्यस्त सड़कों और बाजारों के बीच स्थित यह पार्क लोगों को खुला स्थान उपलब्ध कराता है। यहां समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम और दूसरे सार्वजनिक आयोजन भी होते हैं।
गांवों से आधुनिक राजधानी तक का सफर
दिल्ली का सेंट्रल पार्क इस बात का उदाहरण है कि शहरी विकास के साथ किसी स्थान का स्वरूप किस तरह बदल सकता है। जिस इलाके में कभी गांव और हरियाली हुआ करती थी, वह पहले नई राजधानी की योजना का हिस्सा बना, फिर कनॉट प्लेस जैसे व्यावसायिक केंद्र के बीच एक सार्वजनिक पार्क के रूप में उभरा।
आज कनॉट प्लेस और सेंट्रल पार्क दिल्ली की ऐतिहासिक विरासत, आधुनिक शहरी जीवन और राष्ट्रीय पहचान को एक साथ प्रस्तुत करते हैं। यहां की इमारतें अतीत की कहानी कहती हैं, जबकि बीच में लहराता तिरंगा इस जगह को वर्तमान भारत की पहचान से जोड़ता है।

