PG के नाम पर मौत का कारोबार? दिल्ली में छात्रों की जिंदगी से खिलवाड़ का सनसनीखेज सच
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द | विशेष खोजी रिपोर्ट
दिल्ली पढ़ने आने वाले युवा अपने सपनों को पंख लगाने के लिए राजधानी का रुख करते हैं। कोई UPSC की तैयारी करता है, कोई विश्वविद्यालय में पढ़ाई के लिए आता है तो कोई नौकरी और बेहतर करियर की तलाश में दिल्ली पहुंचता है। लेकिन इन छात्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ पढ़ाई और प्रतियोगिता नहीं है। सवाल उनकी रहने की सुरक्षा का भी है।
महंगा PG कमरा, मनमाना किराया, सिक्योरिटी मनी, बिजली-पानी के अलग-अलग शुल्क, छोटे कमरों में जरूरत से ज्यादा छात्रों को रखना, बेसमेंट और छतों के कथित व्यावसायिक इस्तेमाल, अग्नि सुरक्षा और आपातकालीन निकासी जैसे मुद्दे लंबे समय से चर्चा में हैं।
हालिया सत्य निकेतन PG इमारत हादसे ने एक बार फिर दिल्ली की छात्र आवास व्यवस्था और सरकारी निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पांच मंजिला PG इमारत गिरने से सात लोगों की मौत हुई। हादसे के बाद MCD ने दक्षिणी क्षेत्र के पांच अधिकारियों को निलंबित किया, जबकि इमारत से जुड़े परिवार के तीन सदस्यों को गिरफ्तार किया गया।
सत्य निकेतन हादसे ने उठाया बड़ा सवाल
दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली का सत्य निकेतन इलाका बड़ी संख्या में छात्रों और PG में रहने वाले युवाओं के लिए जाना जाता है। इसी इलाके में एक पांच मंजिला इमारत के ढहने से सात लोगों की जान चली गई।
हादसे के बाद राहत और बचाव अभियान करीब 27 घंटे तक चला। पुलिस ने इमारत के मालिक हरिराम गुप्ता, उनकी पत्नी उर्मिला गुप्ता और बेटे महेश गुप्ता को गिरफ्तार किया। अदालत ने हरिराम और उर्मिला गुप्ता को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा, जबकि उनके बेटे को पुलिस रिमांड पर भेजा गया।
इस घटना के बाद MCD के पांच अधिकारियों का निलंबन भी हुआ। इनमें दक्षिण क्षेत्र के डिप्टी कमिश्नर समेत अधिकारी शामिल हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर इमारत में नियमों का उल्लंघन था या उसकी संरचना को लेकर गंभीर खतरे थे, तो प्रशासन की निगरानी व्यवस्था हादसे से पहले क्यों सक्रिय नहीं हुई?
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए PG और छात्र आवासों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। इसके बाद PG हब में इमारतों के स्ट्रक्चरल ऑडिट और सुरक्षा नीति पर चर्चा तेज हुई है।
यह सिर्फ एक इमारत नहीं, पूरे सिस्टम पर सवाल है
सत्य निकेतन, मुखर्जी नगर, राजेंद्र नगर, मालवीय नगर, कटवरिया सराय, मुनीरका, बेर सराय, कमला नगर और मॉडल टाउन जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में छात्र किराये के कमरे, हॉस्टल और PG में रहते हैं।
इन इलाकों में छात्रों की भारी आबादी के कारण PG कारोबार तेजी से बढ़ा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर इमारत का इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए किया जा रहा है, जिसके लिए उसे अनुमति मिली है?
क्या हर मंजिल की वैधता की नियमित जांच होती है?
क्या अग्नि सुरक्षा के इंतजाम वास्तव में काम करने की स्थिति में हैं?
क्या आपातकालीन निकास रास्ते हमेशा खुले रहते हैं?
क्या बेसमेंट का इस्तेमाल केवल अनुमत उद्देश्य के लिए किया जा रहा है?
क्या अतिरिक्त कमरे बनाकर भवन की क्षमता से अधिक छात्रों को रखा जा रहा है?
और सबसे अहम सवाल—सरकारी निरीक्षण हादसे से पहले क्यों नहीं दिखाई देता?
राजेंद्र नगर: बेसमेंट में तीन छात्रों की मौत ने चेताया था
साल 2024 में दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर स्थित Rau’s IAS Study Circle के बेसमेंट में पानी भरने से तीन UPSC अभ्यर्थियों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
भारी बारिश के दौरान बेसमेंट में तेजी से पानी भर गया और वहां मौजूद छात्रों के लिए बाहर निकलना मुश्किल हो गया। इस हादसे ने बेसमेंट के व्यावसायिक इस्तेमाल, जल निकासी व्यवस्था, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए।
घटना के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना कि जिन बेसमेंट का इस्तेमाल पार्किंग या स्टोरेज जैसे कार्यों के लिए निर्धारित है, उन्हें क्या वास्तव में लाइब्रेरी या अन्य गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था।
यह सवाल आज भी महत्वपूर्ण है—अगर किसी परिसर में सुरक्षा नियमों का उल्लंघन हो रहा था तो कार्रवाई हादसे के बाद ही क्यों हुई?
मालवीय नगर होटल अग्निकांड ने भी खोली व्यवस्था की पोल
3 जून 2026 को दिल्ली के मालवीय नगर में हुए भीषण होटल अग्निकांड ने भी सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। इस हादसे में 22 लोगों की मौत हुई।
दिल्ली पुलिस ने इस मामले में होटल मालिक लोकेश बजाज समेत तीन लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। पुलिस के अनुसार, 26 कमरों वाले प्रतिष्ठान को B&B नियमों के उल्लंघन के आरोपों के बीच चलाया जा रहा था। अदालत ने सितंबर में दाखिल चार्जशीट पर संज्ञान भी लिया।
यह घटना भी बताती है कि किसी भवन में आग लगने के बाद केवल फायर ब्रिगेड की प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं है। असली सुरक्षा तब होती है जब भवन में पहले से ही सुरक्षित निकासी मार्ग, पर्याप्त अग्निशमन उपकरण, स्पष्ट इमरजेंसी एग्जिट और नियमों के मुताबिक संचालन सुनिश्चित किया जाए।
PG मालिकों की मनमानी का सवाल
दिल्ली आने वाला छात्र अक्सर अपने परिवार से दूर रहता है। उसे कम समय में कॉलेज, विश्वविद्यालय या कोचिंग संस्थान के आसपास कमरा चाहिए।
यही मजबूरी कई बार उसे महंगे और असुरक्षित विकल्पों के सामने खड़ा कर देती है।
छात्रों की शिकायतों में अक्सर इन मुद्दों का जिक्र सामने आता है—
- मनमाना किराया
- भारी सिक्योरिटी मनी
- बिजली-पानी के अलग-अलग शुल्क
- छोटे कमरे में अधिक लोगों को रखना
- अतिरिक्त बेड के नाम पर अधिक किराया
- CCTV और निगरानी को लेकर निजता के सवाल
- आने-जाने के समय पर पाबंदी
- आपातकालीन निकास की कमी
- अग्नि सुरक्षा उपकरणों की स्थिति पर सवाल
- शिकायत करने पर कमरा खाली करने का दबाव
हालांकि हर PG या मकान मालिक को एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा, लेकिन जहां नियमों का उल्लंघन हो रहा है वहां प्रभावी निगरानी जरूरी है।
छात्र ग्राहक हैं या मजबूर शिकार?
PG कारोबार में रहने वाला छात्र केवल किराया देने वाला ग्राहक नहीं है। वह एक ऐसा युवा है जो अपने भविष्य के लिए घर से दूर रह रहा है।
इसलिए उसे सुरक्षित भवन, स्वच्छ वातावरण, उचित निकासी व्यवस्था और बुनियादी सुरक्षा मिलना जरूरी है।
अगर कोई मकान मालिक भवन की क्षमता से अधिक लोगों को रखता है, अवैध निर्माण करता है या सुरक्षा मानकों की अनदेखी करता है तो इसका असर सीधे वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी पर पड़ता है।
यही वजह है कि PG की जांच को केवल कागजी प्रक्रिया न मानकर वास्तविक सुरक्षा निरीक्षण से जोड़ना जरूरी है।
MCD और अन्य एजेंसियों की जिम्मेदारी कितनी?
सत्य निकेतन हादसे के बाद पांच MCD अधिकारियों का निलंबन इस सवाल को और गंभीर बनाता है कि भवन नियमों और सुरक्षा मानकों की निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है।
किसी भी हादसे के बाद जांच और कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि संभावित खतरे को हादसे से पहले पहचाना जाए।
अगर किसी इमारत में अवैध निर्माण है तो उसे हादसे से पहले चिन्हित किया जाना चाहिए।
अगर किसी भवन की संरचना कमजोर है तो वहां रहने वालों को पहले ही सुरक्षित स्थान पर भेजा जाना चाहिए।
अगर फायर एग्जिट बंद है तो निरीक्षण के दौरान ही उसे खुलवाया जाना चाहिए।
और अगर भवन का इस्तेमाल स्वीकृत उपयोग से अलग तरीके से किया जा रहा है तो समय रहते कार्रवाई होनी चाहिए।
अब जरूरी है जवाबदेही, सिर्फ जांच नहीं
सत्य निकेतन हादसे के बाद PG हब की इमारतों का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराने और सार्वजनिक उपयोग वाली इमारतों के लिए नई सुरक्षा नीति तैयार करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि यह व्यवस्था कितने समय तक प्रभावी रहेगी?
क्या ऑडिट केवल हादसे के बाद कुछ दिनों तक चलेगा?
क्या खतरनाक इमारतों की सूची सार्वजनिक की जाएगी?
क्या नियमों का उल्लंघन करने वाले PG संचालकों पर समय रहते कार्रवाई होगी?
क्या छात्रों के लिए शिकायत की कोई आसान और प्रभावी व्यवस्था होगी?
और क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी?
दिल्ली के छात्रों को सुरक्षित आवास चाहिए
राजधानी में देशभर से छात्र पढ़ने आते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, जामिया, प्रतियोगी परीक्षाओं के कोचिंग हब और निजी शिक्षण संस्थानों के आसपास हजारों छात्र PG और किराये के कमरों में रहते हैं।
इन छात्रों के लिए सुरक्षित आवास कोई लग्जरी नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरत है।
सत्य निकेतन की त्रासदी ने एक बार फिर चेताया है कि चमकती दिल्ली के पीछे एक ऐसी व्यवस्था भी है जहां भवन की एक छोटी-सी अनदेखी कई परिवारों की जिंदगी उजाड़ सकती है।
राजेंद्र नगर ने बेसमेंट सुरक्षा पर सवाल उठाया था। मालवीय नगर ने अग्नि सुरक्षा और भवन संचालन की निगरानी पर सवाल खड़े किए। अब सत्य निकेतन ने संरचनात्मक सुरक्षा और PG व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल
हर हादसे के बाद कुछ गिरफ्तारियां होती हैं, कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई होती है, जांच समितियां बनती हैं और कुछ समय बाद मामला सुर्खियों से गायब हो जाता है।
लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब अगला हादसा होने से पहले प्रशासन किसी खतरनाक इमारत को पहचान ले।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हादसे के बाद कौन जिम्मेदार है।
सवाल यह है कि हादसा होने से पहले जिम्मेदार कौन जागेगा?
दिल्ली में पढ़ने आए युवाओं के सपने किसी जर्जर इमारत, अवैध निर्माण, बंद निकासी मार्ग या लापरवाह व्यवस्था की भेंट नहीं चढ़ने चाहिए।
PG कारोबार में मुनाफा जरूरी हो सकता है, लेकिन छात्रों की जिंदगी से बड़ा कोई मुनाफा नहीं हो सकता।
रिपोर्टर; गरिमा छाबड़ा, विशेष रिपोर्टर, विपणन प्रबंधक, जनसंपर्क प्रबंधक
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