रामलीला से औद्योगिक क्रांति तक: भारत का धन, युवाओं का भविष्य और विकास की वास्तविक प्राथमिकताएं
क्या भारत अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को सुरक्षित रखते हुए विज्ञान, शिक्षा, अनुसंधान और उद्योग के क्षेत्र में विश्व का अग्रणी देश बन सकता है?
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द | विशेष संपादकीय
प्रस्तावना: भारत को केवल उत्सव नहीं, भविष्य निर्माण का भी संकल्प चाहिए
भारत विविध धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं वाला देश है। यहां रामलीलाएं होती हैं, दशहरे पर रावण के पुतले जलाए जाते हैं, गणेशोत्सव मनाया जाता है, दुर्गापूजा के भव्य पंडाल सजते हैं और नवरात्रि में गरबा तथा डांडिया के आयोजन होते हैं।
इन आयोजनों से लोगों को धार्मिक संतोष, सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक एकता और मनोरंजन मिलता है। इनके माध्यम से कलाकारों, कारीगरों, मंच सज्जाकारों, प्रकाशकर्मियों, ध्वनि विशेषज्ञों, वस्त्र निर्माताओं, परिवहनकर्मियों और छोटे व्यापारियों को आजीविका भी मिलती है।
लेकिन एक लोकतांत्रिक और विकासशील राष्ट्र के सामने इससे भी बड़ा प्रश्न है।
क्या हम अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को सुरक्षित रखते हुए शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक कारखानों, स्वदेशी मशीनों और रोजगार निर्माण पर पर्याप्त ध्यान दे रहे हैं?
क्या भारत के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है? क्या हमारे युवा उन्नत अर्धचालक चिप, विमान इंजन, औद्योगिक यंत्रमानव, आधुनिक मशीनें, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और ऊर्जा संबंधी नई तकनीकें विकसित कर रहे हैं? क्या देश का सार्वजनिक धन भविष्य की पीढ़ियों के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक तथा औद्योगिक क्षमता तैयार कर रहा है?
इन प्रश्नों का उत्तर भावनाओं से नहीं, बल्कि प्रमाणित आंकड़ों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और निष्पक्ष आर्थिक विश्लेषण से खोजना होगा।
हमारा उद्देश्य किसी धर्म, आस्था या सांस्कृतिक आयोजन का अपमान करना नहीं है। हमारा उद्देश्य यह जानना है कि भारत अपनी आस्था, संस्कृति और उत्सवों के साथ-साथ ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और उत्पादन में भी विश्व की अग्रणी शक्तियों में कैसे शामिल हो सकता है।
1. भारत में कितनी रामलीलाएं होती हैं और उन पर कितना धन खर्च होता है?
भारत के प्रत्येक राज्य, नगर, कस्बे और अनेक गांवों में रामलीलाओं का आयोजन होता है। कहीं छोटे मंच पर कुछ दिनों तक नाटक प्रस्तुत किया जाता है, तो कहीं विशाल मैदानों में कई दिनों तक भव्य आयोजन होते हैं।
लेकिन भारत में प्रतिवर्ष होने वाली सभी रामलीलाओं की एकीकृत और प्रमाणित राष्ट्रीय गणना तथा उन पर होने वाले कुल व्यय का सर्वमान्य सार्वजनिक आंकड़ा उपलब्ध हुए बिना निश्चित संख्या बताना उचित नहीं होगा।
एक छोटी रामलीला का खर्च कुछ हजार या लाख रुपये हो सकता है, जबकि बड़े आयोजनों का व्यय इससे बहुत अधिक हो सकता है। इसमें मंच, कलाकारों का पारिश्रमिक, ध्वनि, प्रकाश, सजावट, सुरक्षा, बिजली, प्रचार, परिवहन और मैदान की व्यवस्था शामिल होती है।
इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर सही जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रत्येक राज्य, स्थानीय निकाय, रामलीला समिति, प्रायोजक और संबंधित संस्था से आंकड़े एकत्र करना आवश्यक है।
सरकार तथा संबंधित संस्थाओं को एक सार्वजनिक विवरण तैयार करना चाहिए, जिसमें निम्नलिखित जानकारियां हों:
- प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली रामलीलाओं की कुल संख्या।
- छोटे, मध्यम और बड़े आयोजनों का वर्गीकरण।
- सार्वजनिक धन, निजी चंदे और प्रायोजन से प्राप्त राशि।
- कुल व्यय तथा उससे उत्पन्न आजीविका के अवसर।
- कलाकारों, तकनीशियनों और कारीगरों को मिलने वाला पारिश्रमिक।
- सुरक्षा, अग्निशमन, स्वच्छता और पर्यावरण पर होने वाला खर्च।
जब किसी आयोजन पर सार्वजनिक धन खर्च होता है, तो उस धन का विवरण जनता के सामने होना चाहिए।
जहां आयोजन पूरी तरह निजी चंदे से होते हैं, वहां भी स्वैच्छिक लेखा-पारदर्शिता से जनता का विश्वास बढ़ सकता है।
2. रावण दहन पर कितना खर्च होता है?
दशहरे पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाने की परंपरा अनेक स्थानों पर प्रचलित है। पुतलों की ऊंचाई, निर्माण सामग्री, सजावट, आतिशबाजी, मैदान, सुरक्षा और दर्शकों की संख्या के आधार पर खर्च अलग-अलग होता है।
किसी छोटे आयोजन में सीमित राशि खर्च हो सकती है, जबकि बड़े सार्वजनिक समारोहों में पुतलों के निर्माण, मंच, प्रकाश, ध्वनि, सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाओं पर काफी अधिक धन लगाया जा सकता है।
हालांकि, पूरे भारत में रावण दहन पर होने वाले कुल वार्षिक खर्च का विश्वसनीय राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध हुए बिना कोई निश्चित रकम बताना उचित नहीं होगा।
इस विषय पर सार्थक चर्चा के लिए कुछ प्रश्न महत्वपूर्ण हैं:
- नगर निकायों और अन्य सरकारी संस्थाओं द्वारा ऐसे आयोजनों पर कितना सार्वजनिक धन खर्च किया जाता है?
- निजी चंदे और प्रायोजन से कितनी राशि प्राप्त होती है?
- आयोजन से कितने स्थानीय कलाकारों और श्रमिकों को रोजगार मिलता है?
- सुरक्षा, अग्निशमन, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के लिए कितनी राशि निर्धारित होती है?
- क्या आयोजन के बाद आय-व्यय का विवरण सार्वजनिक किया जाता है?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। किसी सांस्कृतिक आयोजन पर होने वाला खर्च अपने आप में व्यर्थ खर्च नहीं माना जा सकता। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिल सकता है, पारंपरिक कलाओं का संरक्षण हो सकता है और अनेक परिवारों को रोजगार मिल सकता है।
वास्तविक प्रश्न यह है कि सार्वजनिक धन का उपयोग पारदर्शी तरीके से हो रहा है या नहीं और विकास की अन्य आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं या नहीं।
3. क्या सांस्कृतिक आयोजनों और औद्योगिक विकास में टकराव है?
भारत की सांस्कृतिक परंपराएं उसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। रामलीला और अन्य पारंपरिक आयोजन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास, साहित्य, लोककला और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम भी हैं।
इन आयोजनों को औद्योगिक विकास के विरोध में खड़ा करना उचित नहीं होगा।
एक देश सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए विज्ञान, शिक्षा और आधुनिक उद्योगों में भी निवेश कर सकता है। वास्तव में, संतुलित विकास का अर्थ यही है कि सांस्कृतिक धरोहर और आर्थिक प्रगति दोनों को महत्व दिया जाए।
लेकिन जब संसाधन सीमित हों, तब सरकारों को प्राथमिकताएं स्पष्ट करनी चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान, पेयजल, परिवहन और रोजगार जैसे क्षेत्रों में आवश्यक निवेश प्रभावित नहीं होना चाहिए।
सार्वजनिक धन के उपयोग में यह देखना जरूरी है कि प्रत्येक खर्च से समाज को क्या लाभ मिलता है, उसके परिणाम क्या हैं और क्या वही संसाधन किसी अन्य महत्वपूर्ण आवश्यकता को बेहतर ढंग से पूरा कर सकते थे।
4. भारत के युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आधुनिक प्रयोगशालाएं कब मिलेंगी?
भारत की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक उसकी युवा आबादी है। लेकिन युवा आबादी तभी देश की वास्तविक ताकत बन सकती है, जब उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, व्यावहारिक प्रशिक्षण, आधुनिक प्रयोगशालाएं और रोजगार के अवसर मिलें।
देश के अनेक विद्यार्थियों की आकांक्षा है कि वे वैज्ञानिक, अभियंता, चिकित्सक, शोधकर्ता, तकनीकी विशेषज्ञ और उद्यमी बनें। इन आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए शिक्षा व्यवस्था में निरंतर सुधार आवश्यक है।
विद्यालयों में विज्ञान प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, प्रशिक्षित शिक्षक और डिजिटल संसाधन उपलब्ध होने चाहिए। उच्च शिक्षा संस्थानों में शोध के अवसर बढ़ाने के साथ विद्यार्थियों को वास्तविक औद्योगिक समस्याओं पर काम करने का अवसर मिलना चाहिए।
तकनीकी शिक्षा को केवल परीक्षा और प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं रखा जा सकता। विद्यार्थियों को मशीनों के डिजाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्रोग्रामिंग, सामग्री विज्ञान, ऊर्जा तकनीक और स्वचालन जैसे विषयों में व्यावहारिक अनुभव मिलना चाहिए।
इसके साथ ही, ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा तकनीकी प्रशिक्षण तक पहुंच मिलनी चाहिए।
यदि भारत को वैश्विक औद्योगिक शक्ति बनना है, तो प्रत्येक प्रतिभाशाली विद्यार्थी को सीखने, प्रयोग करने और नई तकनीक विकसित करने का अवसर देना होगा।
5. अनुसंधान और नवाचार पर निवेश क्यों जरूरी है?
किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था की मजबूती केवल उपभोग पर नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुसंधान और नई तकनीक विकसित करने की क्षमता पर भी निर्भर करती है।
अर्धचालक चिप, विमान इंजन, औद्योगिक यंत्रमानव, आधुनिक चिकित्सा उपकरण, बैटरी, स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण जैसी तकनीकों के विकास के लिए लंबे समय तक वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी निवेश की आवश्यकता होती है।
यदि कोई देश इन क्षेत्रों में अपनी क्षमता विकसित नहीं करता, तो उसे महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
भारत को विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाना चाहिए। शोधकर्ताओं को आधुनिक उपकरण, पर्याप्त वित्तीय सहायता और स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने का अवसर मिलना चाहिए।
अनुसंधान के परिणामों को उद्योगों तक पहुंचाने के लिए ऐसी व्यवस्था भी जरूरी है, जिससे प्रयोगशाला में विकसित तकनीक व्यावसायिक उत्पादन में बदल सके।
इसके लिए कुछ प्रमुख कदम उठाए जा सकते हैं:
- वैज्ञानिक अनुसंधान और विकास के लिए निरंतर निवेश।
- विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच साझेदारी।
- स्वदेशी तकनीक विकसित करने वाले उद्यमों को सहयोग।
- विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए नवाचार अनुदान।
- पेटेंट, तकनीकी हस्तांतरण और उत्पाद विकास की बेहतर व्यवस्था।
- असफल प्रयोगों से सीखने और नए समाधान खोजने के लिए अनुकूल वातावरण।
भारत की वैज्ञानिक क्षमता को मजबूत करने का अर्थ केवल अधिक धन खर्च करना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि निवेश से उपयोगी ज्ञान, तकनीक, रोजगार और सामाजिक लाभ पैदा हों।
6. आधुनिक कारखाने और स्वदेशी मशीनें—रोजगार निर्माण की आधारशिला
भारत में रोजगार बढ़ाने के लिए ऐसे उद्योगों का विकास महत्वपूर्ण है, जो घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ विश्व बाजार में भी प्रतिस्पर्धा कर सकें।
आधुनिक कारखानों में केवल मशीनें लगाना पर्याप्त नहीं है। उनके संचालन के लिए प्रशिक्षित श्रमिक, अभियंता, तकनीशियन, गुणवत्ता विशेषज्ञ, डिजाइनर और प्रबंधन कर्मियों की आवश्यकता होती है।
इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक मशीनरी, औषधि निर्माण, वाहन उद्योग, विमानन, नवीकरणीय ऊर्जा और कृषि उपकरण जैसे क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने से रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
भारत को ऐसी मशीनें और उपकरण विकसित करने पर भी ध्यान देना चाहिए, जिनका उपयोग कृषि, निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं और छोटे उद्योगों में हो सके।
यदि छोटे तथा मध्यम उद्यमों को आधुनिक तकनीक, सुलभ ऋण, प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो वे भी औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन औद्योगिक विस्तार के साथ श्रमिकों के अधिकार, सुरक्षित कार्यस्थल, उचित पारिश्रमिक और पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखना भी आवश्यक है।
विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना होना चाहिए।
7. भारत को अर्धचालक चिप और विमान इंजन जैसी तकनीकों में आगे कैसे बढ़ना चाहिए?
आधुनिक अर्थव्यवस्था में अर्धचालक चिप, विमान इंजन, औद्योगिक स्वचालन और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स का विशेष महत्व है। इन क्षेत्रों में तकनीकी क्षमता विकसित करने के लिए व्यापक ज्ञान, उच्चस्तरीय प्रयोगशालाएं, कुशल मानव संसाधन और लंबे समय की औद्योगिक रणनीति की जरूरत होती है।
अर्धचालक उद्योग में चिप डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और पैकेजिंग अलग-अलग लेकिन परस्पर जुड़े क्षेत्र हैं। इसी प्रकार विमान इंजन विकसित करने के लिए उन्नत सामग्री, ताप सहन करने वाली मिश्रधातुओं, सटीक निर्माण और जटिल परीक्षणों की क्षमता चाहिए।
इन तकनीकों में प्रगति के लिए भारत को विदेशी विशेषज्ञता से सीखने के साथ अपने वैज्ञानिकों और अभियंताओं की क्षमता भी बढ़ानी होगी।
सरकार, उद्योग और शोध संस्थानों को दीर्घकालिक योजनाएं बनानी चाहिए। केवल कारखाना स्थापित कर देना पर्याप्त नहीं होगा; तकनीकी ज्ञान, स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं, गुणवत्ता नियंत्रण और निरंतर नवाचार की व्यवस्था भी विकसित करनी होगी।
स्वदेशी तकनीक का अर्थ दुनिया से अलग हो जाना नहीं है। इसका अर्थ है कि भारत महत्वपूर्ण तकनीकों को समझने, विकसित करने, सुधारने और जरूरत पड़ने पर स्वयं उत्पादन करने की पर्याप्त क्षमता रखे।
8. सार्वजनिक धन की प्राथमिकताएं कैसे तय होनी चाहिए?
सरकार के पास उपलब्ध संसाधन सीमित होते हैं, जबकि जनता की जरूरतें व्यापक होती हैं। इसलिए बजट बनाते समय शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, विज्ञान, सुरक्षा, सामाजिक कल्याण और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
सार्वजनिक धन से आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मूल्यांकन पारदर्शिता और सामाजिक लाभ के आधार पर किया जाना चाहिए। साथ ही, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि विद्यालयों, अस्पतालों, शोध संस्थानों और आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों।
इस दिशा में कुछ व्यावहारिक कदम उपयोगी हो सकते हैं:
- सरकारी खर्च का स्पष्ट और सार्वजनिक विवरण।
- योजनाओं के परिणामों का स्वतंत्र मूल्यांकन।
- शिक्षा और अनुसंधान में दीर्घकालिक निवेश।
- उद्योगों तथा कौशल विकास के लिए प्रभावी योजनाएं।
- स्थानीय रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के लाभ का आकलन।
- सार्वजनिक परियोजनाओं में भ्रष्टाचार रोकने के लिए मजबूत निगरानी।
किसी एक आयोजन के खर्च को पूरे देश की आर्थिक समस्या का कारण बताना सही नहीं होगा। विकास की वास्तविक तस्वीर समझने के लिए कुल बजट, विभिन्न क्षेत्रों में निवेश, आर्थिक लाभ और दीर्घकालिक परिणामों का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी है।
9. सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक विज्ञान साथ-साथ आगे बढ़ें
भारत की सांस्कृतिक विरासत उसकी पहचान और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रामलीला, लोकनाट्य, संगीत, नृत्य, हस्तशिल्प और पारंपरिक कलाएं पीढ़ियों से ज्ञान तथा अनुभव को आगे बढ़ाती आई हैं।
इन परंपराओं को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर नए आर्थिक अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं। मंच निर्माण में आधुनिक सामग्री, प्रकाश व्यवस्था में ऊर्जा दक्षता, डिजिटल अभिलेखन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बेहतर प्रसारण से कलाकारों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए नए अवसर बन सकते हैं।
इसी तरह, पारंपरिक हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों को आधुनिक डिजाइन, गुणवत्ता नियंत्रण और डिजिटल बाजारों से जोड़ने पर कारीगरों की आय बढ़ाने की संभावनाएं बन सकती हैं।
इसलिए सांस्कृतिक संरक्षण और औद्योगिक विकास को विरोधी मानने के बजाय परस्पर सहयोगी बनाया जाना चाहिए।
देश की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए वैज्ञानिक सोच, तर्क, शोध और नवाचार को प्रोत्साहित करना एक मजबूत लोकतांत्रिक समाज की पहचान है।
10. युवाओं के भविष्य के लिए राष्ट्रीय विकास संकल्प
भारत के युवाओं को ऐसा वातावरण मिलना चाहिए, जिसमें वे केवल रोजगार तलाशने वाले नहीं, बल्कि नई तकनीक विकसित करने वाले, उद्यम स्थापित करने वाले और समाज की समस्याओं का समाधान खोजने वाले नागरिक बन सकें।
इसके लिए शिक्षा, कौशल विकास, अनुसंधान और उद्योगों के बीच मजबूत संबंध बनाना जरूरी है।
विद्यालयों में वैज्ञानिक जिज्ञासा को बढ़ावा देना चाहिए। महाविद्यालयों में व्यावहारिक प्रशिक्षण और उद्योगों से जुड़ी परियोजनाएं उपलब्ध होनी चाहिए। तकनीकी संस्थानों में विद्यार्थियों को नए उत्पाद विकसित करने और अपने विचारों को व्यवसाय में बदलने का अवसर मिलना चाहिए।
साथ ही, रोजगार की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना आवश्यक है। युवाओं को केवल अस्थायी काम नहीं, बल्कि सुरक्षित कार्यस्थल, उचित पारिश्रमिक और आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए।
देश के ग्रामीण क्षेत्रों में भी तकनीकी प्रशिक्षण, स्थानीय उद्योगों और उद्यमिता को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि विकास के अवसर केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहें।
भारत की वास्तविक औद्योगिक क्रांति तभी सफल होगी, जब उसके लाभ समाज के व्यापक वर्गों तक पहुंचेंगे।
निष्कर्ष: परंपराओं का सम्मान, विज्ञान में निवेश और रोजगार का विस्तार
भारत को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं पर गर्व करने के साथ भविष्य की आर्थिक और तकनीकी चुनौतियों के लिए भी तैयार रहना होगा।
रामलीला, दशहरा और अन्य सांस्कृतिक आयोजन समाज को पहचान, एकता, कला और आजीविका प्रदान कर सकते हैं। वहीं, शिक्षा, अनुसंधान, आधुनिक उद्योग और स्वदेशी तकनीक देश को दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती दे सकते हैं।
वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि सांस्कृतिक आयोजनों को समाप्त कर दिया जाए या उन पर होने वाले प्रत्येक खर्च को गलत माना जाए। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या देश अपने संसाधनों का उपयोग पारदर्शी, संतुलित और दूरदर्शी तरीके से कर रहा है।
सरकारों को सार्वजनिक धन के उपयोग का विवरण देना चाहिए। शिक्षा और अनुसंधान में निवेश को मजबूत करना चाहिए। उद्योगों को नवाचार के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा सम्मानजनक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने चाहिए।
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द का विशेष संपादकीय संदेश स्पष्ट है—भारत को अपनी संस्कृति की जड़ों को सुरक्षित रखते हुए विज्ञान, शिक्षा, अनुसंधान, आधुनिक विनिर्माण और रोजगार निर्माण की दिशा में निरंतर आगे बढ़ना होगा।
एक मजबूत भारत वह होगा, जहां रामलीला के कलाकारों को सम्मानजनक आजीविका मिले, बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, वैज्ञानिकों को अनुसंधान के अवसर मिलें, उद्योगों को नई तकनीक विकसित करने का वातावरण मिले और युवाओं को अपनी प्रतिभा के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त हो।
सांस्कृतिक गौरव और वैज्ञानिक प्रगति का संतुलन ही भारत को समृद्ध, आत्मनिर्भर और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी राष्ट्र बनाने की दिशा में सार्थक कदम होगा।

