महाविशेष खोजी रिपोर्ट
मिलावटी खाद्य पदार्थ: देश की थाली में जहर का कारोबार कैसे पहुंच रहा बाजार तक?
मिलावटी दूध से नकली पनीर, नकली घी से मसाले और पैकेज्ड फूड तक—जब जांच में बार-बार सामने आ रहे हैं घटिया और असुरक्षित खाद्य पदार्थ, तो करोड़ों भारतीयों की रसोई तक यह माल पहुंचता कैसे है?
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द | विशेष पड़ताल
नई दिल्ली।
भारत में भोजन केवल बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं है। यह करोड़ों परिवारों के जीवन, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था का आधार है। लेकिन इसी भोजन की गुणवत्ता को लेकर सामने आने वाली शिकायतें और जांच अभियान एक गंभीर सवाल खड़ा करते हैं—जब देश में खाद्य सुरक्षा के लिए कानून, नियामक संस्था, राज्य खाद्य सुरक्षा विभाग, अधिकारी, प्रयोगशालाएं और लाइसेंसिंग व्यवस्था मौजूद है, तो मिलावटी खाद्य पदार्थ बाजार तक पहुंच कैसे जाते हैं?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खाद्य सुरक्षा का तंत्र केवल एक संस्था तक सीमित नहीं है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI देश में खाद्य सुरक्षा के लिए मानक, नियमन, लाइसेंसिंग और निगरानी की केंद्रीय भूमिका निभाता है। वहीं राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की खाद्य सुरक्षा मशीनरी मैदानी स्तर पर निरीक्षण, सैंपलिंग और कार्रवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यानी समस्या को समझने के लिए पूरे सिस्टम को देखना होगा—निर्माता से लेकर उपभोक्ता की थाली तक।
मिलावट सिर्फ दूध तक सीमित नहीं
मिलावटी खाद्य पदार्थ का मतलब केवल दूध में पानी मिलाना नहीं है।
दूध और दुग्ध उत्पादों से लेकर पनीर, घी, खाद्य तेल, मसाले, अनाज, मिठाइयां, नमकीन और पैकेज्ड फूड तक खाद्य गुणवत्ता की निगरानी जरूरी है।
FSSAI के पास दूध और दुग्ध उत्पादों के लिए अलग-अलग विश्लेषण पद्धतियां और मानक मौजूद हैं। पनीर और दूसरे दुग्ध उत्पादों के लिए भी निर्धारित मानक हैं।
समस्या तब शुरू होती है जब किसी उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता और उसके लेबल या दावे में अंतर हो।
यही वजह है कि खाद्य सुरक्षा अधिकारियों द्वारा सैंपलिंग और प्रयोगशाला जांच की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
FSSAI आखिर करता क्या है?
FSSAI यानी Food Safety and Standards Authority of India, खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत काम करने वाला वैधानिक प्राधिकरण है।
इसका उद्देश्य वैज्ञानिक आधार पर खाद्य मानक तय करना, खाद्य कारोबारों के लिए नियामक ढांचा तैयार करना और देश में सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में काम करना है। FSSAI की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, प्राधिकरण देशभर में खाद्य कारोबारों की लाइसेंसिंग, निरीक्षण, टेस्टिंग और अनुपालन व्यवस्था संचालित करता है।
लेकिन यह समझना जरूरी है कि हर दुकान पर जाकर हर खाद्य पदार्थ की जांच केवल FSSAI मुख्यालय नहीं करता।
मैदानी स्तर पर राज्य खाद्य सुरक्षा विभागों की बड़ी भूमिका होती है। खाद्य कारोबारों की श्रेणियों में निर्माता, थोक व्यापारी, वितरक, खुदरा विक्रेता, ट्रांसपोर्टर और स्टोरेज यूनिट तक शामिल हैं।
इसलिए किसी शहर या जिले में मिलावटी खाद्य पदार्थ मिलने पर सवाल पूरे खाद्य सुरक्षा तंत्र से जुड़ता है।
जांच होती है, लेकिन असली चुनौती है ‘पहले पकड़ना’
FSSAI की मौजूदा वेबसाइट पर 2025-26 के लिए लाखों निरीक्षण और सैंपल टेस्टिंग का आंकड़ा प्रदर्शित किया गया है। इसका अर्थ है कि निगरानी व्यवस्था बड़े पैमाने पर काम कर रही है।
लेकिन यहां सबसे अहम सवाल है—
जिस नमूने की जांच आज होती है, वह जांच होने से पहले कितने उपभोक्ताओं तक पहुंच चुका था?
यही खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
किसी दुकान से पनीर का नमूना लिया गया। नमूना प्रयोगशाला भेजा गया। रिपोर्ट आने में समय लगा। इस बीच उसी बैच की बाकी सामग्री बिक चुकी हो सकती है।
यानी केवल सैंपलिंग पर्याप्त नहीं है।
जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें संदिग्ध खाद्य पदार्थ की पूरी सप्लाई चेन का पता लगाया जा सके।
एक पनीर की खेप के पीछे छिपी पूरी कहानी
कल्पना कीजिए कि किसी शहर में संदिग्ध पनीर की बड़ी खेप पकड़ी जाती है।
पहला सवाल होगा—पनीर कहां बना?
दूसरा—किसने भेजा?
तीसरा—किस वाहन से आया?
चौथा—किस गोदाम में रखा गया?
पांचवां—किन दुकानदारों को सप्लाई किया गया?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—
क्या इसी स्रोत से पहले भी ऐसी खेपें बाजार में पहुंच चुकी हैं?
अगर कार्रवाई सिर्फ वाहन या एक दुकानदार तक सीमित रह जाए, तो असली नेटवर्क तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए खाद्य सुरक्षा की प्रभावी जांच का दायरा होना चाहिए—
निर्माता → पैकिंग → गोदाम → परिवहन → थोक व्यापारी → वितरक → दुकानदार → उपभोक्ता।
मिलावट के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है प्रयोगशाला
खाद्य पदार्थ को केवल देखकर हमेशा यह तय नहीं किया जा सकता कि वह सुरक्षित है या नहीं।
कई मामलों में वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी होता है। इसी कारण FSSAI अलग-अलग खाद्य उत्पादों के विश्लेषण के लिए आधिकारिक तरीकों और मैनुअल को निर्धारित करता है।
दूध और दुग्ध उत्पादों के लिए भी विशिष्ट विश्लेषण पद्धतियां उपलब्ध हैं।
लेकिन चुनौती सिर्फ प्रयोगशाला की मौजूदगी नहीं है।
चुनौती है—
सैंपल कितनी तेजी से पहुंचा?
टेस्ट कितनी जल्दी हुआ?
रिपोर्ट कितनी जल्दी आई?
और रिपोर्ट आने तक संदिग्ध बैच बाजार से हटाया गया या नहीं?
अगर इन चार सवालों का जवाब कमजोर है, तो सिर्फ प्रयोगशाला होना उपभोक्ता सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकता।
दूध और दुग्ध उत्पाद क्यों बने रहते हैं संवेदनशील क्षेत्र?
भारत में दूध की खपत बहुत बड़ी है और दूध से बने उत्पादों की मांग भी लगातार बनी रहती है।
दूध से पनीर, खोया, दही, घी, मिठाई और दूसरे उत्पाद तैयार होते हैं। इसलिए दूध की सप्लाई चेन में किसी स्तर पर गुणवत्ता से समझौता होने का असर कई दूसरे उत्पादों तक पहुंच सकता है।
FSSAI ने दूध की गुणवत्ता पर राष्ट्रीय स्तर पर सर्वे और निगरानी व्यवस्था भी विकसित की है, जिसमें असुरक्षित और मिलावटी दूध पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
यही कारण है कि दूध और दुग्ध उत्पादों की जांच खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
घी और तेल की गुणवत्ता पर भी नजर
घी और खाद्य तेल भी ऐसे उत्पाद हैं जिनकी बड़ी मात्रा में खपत होती है।
घी में किसी दूसरे वसा या तेल की मिलावट का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक जांच की जरूरत पड़ सकती है। इसी तरह खाद्य तेलों की गुणवत्ता और उनकी संरचना की जांच भी प्रयोगशाला परीक्षण से की जाती है।
उपभोक्ता के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि पैकेट या डिब्बे के अंदर मौजूद वास्तविक सामग्री को देखकर हमेशा पहचानना संभव नहीं होता।
यही वजह है कि भरोसेमंद ब्रांड, सही लेबल और वैध लाइसेंस वाली खाद्य इकाई से खरीदारी करना महत्वपूर्ण है।
मसालों और पैकेज्ड फूड की चुनौती
मसालों का बाजार भी बड़ा है और यहां गुणवत्ता की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
मसालों में किसी बाहरी पदार्थ की मिलावट हो या उत्पाद पर गलत दावा किया गया हो, तो उसका पता वैज्ञानिक जांच से ही बेहतर तरीके से लगाया जा सकता है।
दूसरी तरफ पैकेज्ड फूड की आपूर्ति श्रृंखला कई राज्यों तक फैली हो सकती है।
एक उत्पाद एक राज्य में बन सकता है, दूसरे राज्य में पैक हो सकता है और तीसरे राज्य में बेचा जा सकता है।
ऐसे में स्थानीय स्तर की जांच के साथ-साथ डिजिटल ट्रैकिंग और अंतरराज्यीय समन्वय भी जरूरी हो जाता है।
लाइसेंसिंग व्यवस्था कितनी महत्वपूर्ण है?
खाद्य कारोबार के लिए लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन व्यवस्था खाद्य सुरक्षा तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
FSSAI के FoSCoS पोर्टल पर निर्माता, आयातक, थोक व्यापारी, वितरक, खुदरा विक्रेता, ट्रांसपोर्टर और स्टोरेज जैसी विभिन्न श्रेणियों के खाद्य कारोबार सूचीबद्ध हैं।
इसका अर्थ है कि खाद्य सुरक्षा सिर्फ फैक्ट्री की जांच का विषय नहीं है।
जिस क्षण कोई खाद्य उत्पाद उत्पादन से निकलता है, उसके बाद परिवहन, भंडारण और बिक्री तक कई चरण आते हैं।
हर चरण में नियमों का पालन जरूरी है।
अगर एक कारोबारी पकड़ा गया तो क्या पूरा नेटवर्क भी पकड़ा जाता है?
यही वह सवाल है जिस पर खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
मान लीजिए किसी दुकान से असुरक्षित उत्पाद मिला।
दुकानदार पर कार्रवाई हो गई।
लेकिन अगर वही उत्पाद किसी बड़े नेटवर्क से आया था, तो केवल दुकानदार के खिलाफ कार्रवाई करने से उपभोक्ता सुरक्षा पूरी नहीं होगी।
जरूरत है कि जांच यह पता करे—
स्रोत कौन है?
उत्पादन कहां हुआ?
कितना माल बना?
कहां-कहां भेजा गया?
कितने लाइसेंस और प्रतिष्ठान इससे जुड़े हैं?
क्या इससे पहले भी शिकायत या नमूना विफल हुआ था?
ऐसे सवालों के जवाब से ही खाद्य मिलावट की जड़ तक पहुंचा जा सकता है।
भ्रष्टाचार के मामले सामने आए तो पूरे सिस्टम को दोषी मानना गलत
खाद्य सुरक्षा विभाग में काम करने वाले हर अधिकारी को भ्रष्ट कहना न तो उचित है और न ही तथ्यात्मक।
लेकिन जहां किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ रिश्वत, भ्रष्टाचार या नियमों की अनदेखी के प्रमाण सामने आते हैं, वहां कठोर कार्रवाई जरूरी है।
ऐसे मामलों को पूरे विभाग की तस्वीर नहीं माना जा सकता, लेकिन इन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
खाद्य सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में निरीक्षण करने वाले अधिकारी पर निष्पक्षता और पारदर्शिता की जिम्मेदारी बहुत अधिक होती है।
इसीलिए डिजिटल निरीक्षण रिकॉर्ड, नमूना ट्रैकिंग, प्रयोगशाला रिपोर्ट की निगरानी और शिकायतों के निस्तारण की पारदर्शी व्यवस्था भ्रष्टाचार की संभावना कम करने में मदद कर सकती है।
FSSAI की निगरानी व्यवस्था लगातार विकसित हो रही है
खाद्य सुरक्षा व्यवस्था स्थिर नहीं है। FSSAI समय-समय पर नए नियम, मानक, प्रयोगशाला संबंधी आदेश और तकनीकी व्यवस्थाएं लागू करता है।
जुलाई 2026 में भी FSSAI ने खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं की वैधता से जुड़े आदेश और उच्च क्षमता वाले परीक्षण उपकरणों के तकनीकी विनिर्देश जारी किए।
इससे स्पष्ट है कि खाद्य परीक्षण क्षमता और वैज्ञानिक निगरानी को लगातार मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।
लेकिन नियम और तकनीक तभी प्रभावी होंगे जब उनका जमीनी स्तर पर लगातार और निष्पक्ष इस्तेमाल हो।
उपभोक्ता कैसे पहचानें संदिग्ध खाद्य पदार्थ?
हर मिलावटी खाद्य पदार्थ को आंखों से पहचानना संभव नहीं है। फिर भी उपभोक्ता कुछ बुनियादी सावधानियां बरत सकता है।
खरीदारी करते समय पैकेज की सील, निर्माण और समाप्ति तिथि, लेबल, बैच नंबर और FSSAI लाइसेंस/रजिस्ट्रेशन से जुड़ी जानकारी देखना जरूरी है।
खुले में बिकने वाले खाद्य पदार्थों में साफ-सफाई और भंडारण की स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए।
असामान्य रंग, गंध, बनावट या पैकेजिंग में छेड़छाड़ दिखे तो उत्पाद खरीदने से बचना बेहतर है।
हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि केवल रंग या स्वाद के आधार पर किसी उत्पाद को वैज्ञानिक रूप से मिलावटी घोषित नहीं किया जा सकता।
शिकायत करना भी उपभोक्ता की जिम्मेदारी
अगर किसी उपभोक्ता को खाद्य उत्पाद की गुणवत्ता पर गंभीर संदेह है, तो उसे शिकायत दर्ज करने के आधिकारिक माध्यमों का इस्तेमाल करना चाहिए।
FSSAI की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में उपभोक्ता शिकायत और खाद्य व्यवसाय से जुड़ी प्रक्रियाओं के लिए आधिकारिक डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं। FoSCoS पर खाद्य कारोबार के लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन से जुड़ी सेवाएं भी संचालित होती हैं।
एक शिकायत अकेले पूरे नेटवर्क को नहीं बदल सकती, लेकिन लगातार दर्ज होने वाली शिकायतें निगरानी एजेंसियों को संदिग्ध क्षेत्रों और उत्पादों की पहचान करने में मदद कर सकती हैं।
सिर्फ छापेमारी नहीं, रोकथाम जरूरी
मिलावटी खाद्य पदार्थों के खिलाफ छापेमारी और सैंपलिंग जरूरी है, लेकिन केवल यही समाधान नहीं है।
एक प्रभावी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के लिए पांच स्तरों पर लगातार काम होना चाहिए—
पहला—स्रोत की पहचान।
मिलावटी या असुरक्षित खाद्य पदार्थ कहां तैयार हो रहा है, इसका पता लगाना।
दूसरा—सप्लाई चेन की निगरानी।
निर्माता से लेकर अंतिम विक्रेता तक उत्पाद की आवाजाही पर नजर रखना।
तीसरा—तेज प्रयोगशाला जांच।
संदिग्ध नमूनों की रिपोर्ट जल्द उपलब्ध कराना।
चौथा—प्रभावी कार्रवाई।
गंभीर उल्लंघन और बार-बार नियम तोड़ने वाले कारोबारियों पर कानून के अनुसार कार्रवाई।
पांचवां—सार्वजनिक जवाबदेही।
निरीक्षण, नमूना जांच और कार्रवाई से जुड़े आंकड़ों में अधिक पारदर्शिता।
सबसे बड़ा सवाल: मिलावट बाजार तक पहुंचती ही क्यों है?
यह सवाल सिर्फ किसी एक विभाग से नहीं पूछा जा सकता।
इसके पीछे कई संभावित स्तर हो सकते हैं—बड़ी सप्लाई चेन, कमजोर निगरानी, सीमित निरीक्षण क्षमता, प्रयोगशाला रिपोर्ट में देरी, उपभोक्ता जागरूकता की कमी और कुछ मामलों में नियमों की जानबूझकर अनदेखी।
इसलिए समाधान भी बहुस्तरीय होना चाहिए।
खाद्य कारोबारियों को नियमों का पालन करना होगा।
नियामक संस्थाओं को निगरानी मजबूत करनी होगी।
राज्य विभागों को नियमित और जोखिम-आधारित सैंपलिंग करनी होगी।
प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ानी होगी।
और उपभोक्ताओं को संदिग्ध उत्पादों की शिकायत करने के लिए जागरूक होना होगा।
सवाल एक पैकेट का नहीं, पूरी थाली का है
मिलावटी खाद्य पदार्थ का असर केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता जिसने उसे खरीदा।
दूध से लेकर पनीर और घी तक, मसालों से लेकर पैकेज्ड फूड तक—खाद्य श्रृंखला जितनी लंबी होती है, निगरानी की चुनौती उतनी ही बड़ी होती जाती है।
भारत जैसे विशाल देश में हर उत्पाद की हर खेप की जांच करना संभव नहीं है। इसलिए जोखिम आधारित निरीक्षण, वैज्ञानिक परीक्षण, डिजिटल ट्रैकिंग और तेज कार्रवाई का महत्व और बढ़ जाता है।
FSSAI की आधिकारिक व्यवस्था में लाइसेंसिंग, निरीक्षण, सैंपल टेस्टिंग और खाद्य सुरक्षा निगरानी पहले से मौजूद हैं।
अब चुनौती यह है कि इन व्यवस्थाओं को जमीन पर कितना प्रभावी बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष: असली लड़ाई मिलावट पकड़ने की नहीं, रोकने की है
भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए कानून है। नियामक संस्था है। राज्य स्तरीय विभाग हैं। खाद्य सुरक्षा अधिकारी हैं। प्रयोगशालाएं हैं। लाइसेंसिंग व्यवस्था है।
इसके बावजूद अगर किसी इलाके में बार-बार संदिग्ध या असुरक्षित खाद्य पदार्थ सामने आते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या हमारी निगरानी व्यवस्था पर्याप्त तेज है?
क्या जांच स्रोत तक पहुंचती है?
क्या संदिग्ध बैच समय रहते बाजार से हटता है?
क्या दोषी कारोबारी दोबारा वही काम करने से रोके जाते हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या मिलावटी खाद्य पदार्थ उपभोक्ता की थाली तक पहुंचने से पहले रोके जा रहे हैं?
क्योंकि खाद्य सुरक्षा का अंतिम लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि कितने नमूने फेल हुए और कितनी कार्रवाई हुई।
अंतिम लक्ष्य यह होना चाहिए कि लोगों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण भोजन मिले।
एक सुरक्षित थाली केवल उपभोक्ता का अधिकार नहीं, बल्कि पूरे खाद्य तंत्र की जिम्मेदारी है।
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द की इस विशेष पड़ताल का निष्कर्ष यही है—मिलावट के खिलाफ लड़ाई सिर्फ छापेमारी से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए निर्माता से लेकर बाजार तक पूरी सप्लाई चेन की निगरानी, तेज वैज्ञानिक जांच, पारदर्शी कार्रवाई और उपभोक्ता की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
क्योंकि सवाल सिर्फ खाने का नहीं है—सवाल करोड़ों भारतीयों के स्वास्थ्य का है।
रिपोर्टर; जैस्मिन कौर, मुख्य संवाददता दिल्ली
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द
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