Crude Oil Price $100 के पार, पेट्रोल पर ₹5 और डीजल पर ₹23 का नुकसान; बढ़ी तेल कंपनियों की चिंता
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारत की सरकारी तेल कंपनियों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष तेज होने के बीच Crude Oil Price $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। इसका सीधा असर भारतीय तेल कंपनियों के मार्जिन पर पड़ रहा है और पेट्रोल-डीजल की मौजूदा कीमतों को लेकर दबाव बढ़ रहा है।
फिलहाल घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार तेजी बनी रहती है तो तेल कंपनियों का नुकसान और बढ़ सकता है। ऐसे में आने वाले समय में सरकार और कंपनियों के सामने बढ़ती लागत को संभालना बड़ी चुनौती हो सकती है।
पेट्रोल पर करीब ₹5 और डीजल पर ₹23 तक का नुकसान
रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में सरकारी तेल विपणन कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर नुकसान उठाना पड़ रहा है। अनुमान के अनुसार पेट्रोल पर करीब 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 23 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान बताया जा रहा है।
यह नुकसान मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे कच्चे तेल और घरेलू कीमतों में तत्काल उसके अनुरूप बदलाव नहीं होने के कारण पैदा हुआ है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो तेल कंपनियों के मार्जिन पर और दबाव पड़ सकता है।
ब्रेंट क्रूड ने बढ़ाई चिंता
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA के प्रशांत वशिष्ठ के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने भारतीय तेल कंपनियों की लागत बढ़ा दी है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति और भविष्य की कीमतों को लेकर बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है।
भारत का Import Bill बढ़ने का खतरा
महंगे कच्चे तेल का असर भारत के Import Bill पर भी दिखाई देने लगा है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी PPAC के आंकड़ों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से भारत के लिए तेल आयात का खर्च बढ़ सकता है।
अगर Crude Oil Price लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहता है तो देश के चालू खाते, व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। इसके अलावा महंगा ईंधन अर्थव्यवस्था में परिवहन और उत्पादन लागत को भी प्रभावित कर सकता है।
सरकार के सामने क्या विकल्प हैं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा बना रहता है तो सरकार और तेल कंपनियां इस दबाव से कैसे निपटेंगी। सरकार के पास पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स में बदलाव, तेल कंपनियों के मार्जिन को समायोजित करने और जरूरत पड़ने पर राहत देने जैसे विकल्प हो सकते हैं।
हालांकि, किसी भी कदम का असर सरकारी राजस्व और महंगाई पर भी पड़ सकता है। वहीं तेल कंपनियों के लिए लंबे समय तक कम मार्जिन पर पेट्रोल-डीजल बेचना वित्तीय दबाव बढ़ा सकता है।
आम लोगों पर कब पड़ेगा असर?
फिलहाल उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत बढ़ने के बावजूद घरेलू पेट्रोल-डीजल कीमतों में तत्काल बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। लेकिन अगर पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है और Crude Oil Price लगातार ऊंचा बना रहता है, तो घरेलू ईंधन कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
इसका असर सिर्फ वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहेगा। पेट्रोल और डीजल महंगा होने पर माल ढुलाई, सार्वजनिक परिवहन और विभिन्न वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर महंगाई पर पड़ सकता है।
आगे की राह चुनौतीपूर्ण
कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा तेजी भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है। पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता के कारण आने वाले दिनों में कीमतों पर नजर बनी रहेगी।
अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहता है, तो सरकार के सामने घरेलू ईंधन कीमतों को स्थिर रखने और तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी। फिलहाल बाजार की नजर पश्चिम एशिया के घटनाक्रम और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर टिकी हुई है।
रिपोर्टर; सतविंदर, कौर मुख्य संवाददाता हरियाणा
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द
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