चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है? ज्ञानेश कुमार समेत तीन अधिकारियों की नियुक्ति को चुनौती
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका ने चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर नए कानूनी सवाल खड़े कर दिए हैं। याचिकाकर्ता सूरी पायला ने सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल कर तीनों अधिकारियों की नियुक्तियों की वैधता पर सवाल उठाए हैं। याचिका में अदालत से यह भी मांग की गई है कि नियुक्तियां कानून के अनुरूप नहीं पाए जाने पर संबंधित पदों को रिक्त घोषित किया जाए।
मामला 27 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने की खबर है। हालांकि, अभी तक अदालत ने इन नियुक्तियों को अवैध घोषित नहीं किया है। याचिका में लगाए गए आरोपों और अदालत के अंतिम निर्णय के बीच अंतर समझना जरूरी है।
क्या है पूरा मामला?
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू की 14 मार्च 2024 की नियुक्तियों को चुनौती दी गई है। इसके अलावा, 17 फरवरी 2025 को ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त करने और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त बनाए जाने से संबंधित अधिसूचनाओं पर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धाराओं 5, 6 और 8(1) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया गया।
याचिका में अदालत से नियुक्तियों से जुड़े मूल दस्तावेज मंगाने और चयन प्रक्रिया की कानूनी वैधता की जांच करने का अनुरोध किया गया है।
1. दो पदों के लिए छह नाम ही क्यों भेजे गए?
याचिका का एक प्रमुख आधार मार्च 2024 में चुनाव आयुक्तों के दो रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अधिनियम की धारा 6 के अनुसार खोज समिति को प्रत्येक रिक्त पद के लिए पांच संभावित उम्मीदवारों के नामों का पैनल तैयार करना चाहिए था। इस हिसाब से दो पदों के लिए कुल दस नाम होने चाहिए थे।
लेकिन याचिका के अनुसार, खोज समिति ने केवल छह नामों का पैनल भेजा। याचिकाकर्ता इसे कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं मानते।
इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट को यह देखना पड़ सकता है कि धारा 6 की सही व्याख्या क्या है, खोज समिति के लिए कितने नाम भेजना आवश्यक था और यदि प्रक्रिया में कोई कमी रही, तो उसका नियुक्तियों की वैधता पर क्या प्रभाव पड़ता है।
हालांकि, अधिनियम की धारा 8(2) चयन समिति को खोज समिति के पैनल से बाहर के व्यक्ति पर भी विचार करने की अनुमति देती है। इसलिए केवल नामों की संख्या को लेकर उठे सवाल से नियुक्तियों को स्वतः अवैध नहीं माना जा सकता।
2. क्वो वारंटो याचिका पर क्या कर सकता है सुप्रीम कोर्ट?
याचिकाकर्ता ने तीनों अधिकारियों के खिलाफ क्वो वारंटो यानी अधिकार-पृच्छा की प्रकृति वाली राहत मांगी है। इस कानूनी उपाय के जरिए अदालत किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति से यह स्पष्ट करने को कह सकती है कि वह किस कानूनी अधिकार के तहत उस पद पर बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने कई संभावित विकल्प हो सकते हैं।
पहला विकल्प: मूल रिकॉर्ड तलब करना। अदालत खोज समिति और चयन समिति की बैठक के कार्यवृत्त, उम्मीदवारों की सूची, चयन के आधार और नियुक्तियों से जुड़ी मूल फाइलें मंगा सकती है। इससे यह जांचने में मदद मिलेगी कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं।
दूसरा विकल्प: कानून की व्याख्या करना। अदालत धारा 5, 6 और 8 के प्रावधानों की व्याख्या कर सकती है और यह तय कर सकती है कि नियुक्तियों में अपनाई गई प्रक्रिया कानून के अनुरूप थी या नहीं।
तीसरा विकल्प: याचिका खारिज करना। यदि अदालत को नियुक्तियां रद्द करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं मिलता या वह मांगी गई राहत को स्वीकार करने योग्य नहीं मानती, तो याचिका खारिज की जा सकती है।
चौथा विकल्प: उचित कानूनी राहत देना। यदि अदालत गंभीर कानूनी उल्लंघन पाती है और मानती है कि उसका प्रभाव नियुक्तियों की वैधता पर पड़ता है, तो वह कानून के अनुसार उपयुक्त आदेश दे सकती है। इसमें नियुक्तियों को अवैध ठहराने या पद रिक्त घोषित करने जैसी राहत भी शामिल हो सकती है।
ये संभावित कानूनी रास्ते हैं, अदालत के वास्तविक फैसले का पूर्वानुमान नहीं।
3. क्या तीनों चुनाव आयुक्तों को तुरंत हटाया जा सकता है?
याचिकाकर्ता ने अदालत से तीनों अधिकारियों के पदों को रिक्त घोषित करने की मांग की है। लेकिन याचिका दाखिल होने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित अधिकारियों को तत्काल पद से हटा दिया जाएगा।
अदालत को पहले याचिका में उठाए गए कानूनी सवालों, संबंधित अधिनियम के प्रावधानों और नियुक्तियों के रिकॉर्ड पर विचार करना होगा। वह आवश्यक समझे तो केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों से जवाब भी मांग सकती है।
इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट तीनों अधिकारियों को पद से हटाने जा रहा है। ऐसा कोई अंतिम निष्कर्ष अदालत के निर्णय के बाद ही निकाला जा सकता है।
4. क्या चुनाव आयोग के पुराने फैसले भी रद्द हो सकते हैं?
यह इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक सवाल है। नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका के कारण चुनाव आयोग के सभी पुराने फैसले अपने-आप रद्द नहीं हो जाते।
यदि अदालत नियुक्ति प्रक्रिया की जांच का आदेश देती है, तो केवल उस आदेश से आयोग के सभी पूर्व निर्णयों की वैधता समाप्त नहीं होगी। यदि किसी नियुक्ति को अवैध घोषित किया जाता है, तो उसके प्रभाव का निर्धारण अदालत के आदेश, उसके दायरे और लागू कानूनी सिद्धांतों के आधार पर होगा।
इसी तरह, चुनाव आयोग के किसी विशेष फैसले को चुनौती देने के लिए उस फैसले से संबंधित अलग कानूनी आधार और तथ्य प्रस्तुत करने पड़ सकते हैं।
इस प्रकार नियुक्ति की वैधता और चुनाव आयोग के किसी विशिष्ट निर्णय की वैधता दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।
5. चुनाव प्रबंधन के अनुभव पर भी उठे सवाल
याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि नियुक्त अधिकारियों के सार्वजनिक सेवा रिकॉर्ड में चुनावों के प्रबंधन और संचालन से जुड़ा अनुभव किस हद तक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि 2023 के कानून के तहत नियुक्ति के लिए व्यक्ति की सत्यनिष्ठा के साथ चुनावों के प्रबंधन और संचालन का ज्ञान तथा अनुभव भी प्रासंगिक है।
इस मुद्दे पर अदालत को संबंधित अधिकारियों की योग्यता, उनके प्रशासनिक अनुभव और कानून में निर्धारित पात्रता की शर्तों पर विचार करना पड़ सकता है। हालांकि, किसी अधिकारी के सार्वजनिक परिचय में चुनाव संबंधी जिम्मेदारियों का स्पष्ट उल्लेख न होना अपने-आप यह साबित नहीं करता कि वह कानूनी रूप से अयोग्य है। इसका आकलन पूरे रिकॉर्ड और लागू कानून के आधार पर होगा।
6. भविष्य में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा?
इस मामले का महत्व केवल तीन अधिकारियों की नियुक्तियों तक सीमित नहीं है। अदालत की व्याख्या से भविष्य में चुनाव आयुक्तों के चयन, खोज समिति की भूमिका और चयन समिति के कामकाज को लेकर भी स्पष्टता आ सकती है।
यदि सुप्रीम कोर्ट नियुक्ति प्रक्रिया में किसी कानूनी कमी की पहचान करता है, तो उसके निर्देश भविष्य की नियुक्तियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अदालत यह भी देख सकती है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता, पात्रता के आकलन और निर्णय के आधार से जुड़े वैधानिक प्रावधानों का पालन किस तरह सुनिश्चित किया जाए।
हालांकि, किसी नई व्यवस्था या अतिरिक्त शर्त को लागू करने का सवाल अदालत के आदेश और कानून की व्याख्या पर निर्भर करेगा।
फिलहाल क्या है स्थिति?
11 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सूरी पायला की याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की नियुक्तियों की वैधता को चुनौती दी गई है। मामले में 27 अक्टूबर को सुनवाई सूचीबद्ध होने की खबर है।
अब अदालत के सामने प्रमुख प्रश्न होंगे कि नियुक्ति प्रक्रिया में कानून का पालन हुआ या नहीं, दो रिक्तियों के लिए छह नामों का पैनल पर्याप्त था या नहीं और क्वो वारंटो की राहत इस मामले में दी जा सकती है या नहीं।
फिलहाल नियुक्तियां रद्द होने या तीनों अधिकारियों को पद से हटाए जाने का कोई अंतिम न्यायिक निर्णय सामने नहीं आया है। मामले का परिणाम सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका, संबंधित दस्तावेजों और कानून की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

