गोवा SIR वोटर लिस्ट: ERO ने योग्य माना, फिर भी 97 मतदाताओं के नाम फाइनल लिस्ट से बाहर
नई दिल्ली/पणजी: गोवा में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान वोटर लिस्ट से जुड़े एक मामले ने चुनावी प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर और अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा में 97 ऐसे मतदाता थे, जिनके मामलों की स्थानीय स्तर पर जांच के बाद Electoral Registration Officers (EROs) और Assistant Electoral Registration Officers (AEROs) ने माना कि उन्हें अंतिम मतदाता सूची में शामिल किया जा सकता है। इसके बावजूद 21 फरवरी को प्रकाशित फाइनल SIR वोटर लिस्ट में इन 97 लोगों के नाम शामिल नहीं हो सके।
मामले में सबसे अहम बात यह रही कि स्थानीय चुनाव अधिकारियों के पास पहले लिए गए फैसले को वापस लेने के लिए ECINet में जरूरी ‘रोलबैक’ या ‘रिवर्ट’ सुविधा उपलब्ध नहीं थी। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की ओर से इस सुविधा को उपलब्ध कराने के लिए लगातार अनुरोध किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, 13 से 18 फरवरी के बीच सात दिनों में आठ ईमेल भेजे गए, लेकिन अंतिम सूची प्रकाशित होने तक समस्या का समाधान नहीं हुआ।
क्या है पूरा मामला?
SIR के दौरान कुछ मतदाताओं के नामों में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी रिकॉर्ड से जुड़ी विसंगतियां सामने आई थीं। इसका मतलब अपने आप में यह नहीं था कि संबंधित व्यक्ति मतदाता नहीं है। यह एक तरह का रिकॉर्ड-मिसमैच था, जिसे चुनावी सॉफ्टवेयर ने चिन्हित किया था। ऐसे मामलों में संबंधित मतदाताओं को दस्तावेज और आपत्तियां पेश करने का मौका दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के 29 जनवरी के निर्देशों के बाद ऐसे मामलों की जानकारी सार्वजनिक करने और प्रभावित लोगों को दस्तावेज या आपत्ति पेश करने का अवसर देने की प्रक्रिया अपनाई गई। कोर्ट का निर्देश मूल रूप से तमिलनाडु से जुड़े SIR मामले में था, लेकिन आयोग ने इसे SIR वाले अन्य राज्यों में भी लागू करने की बात कही थी। गोवा में भी इस प्रक्रिया के तहत मतदाताओं को सामने आने और अपना पक्ष रखने का अवसर मिला।
गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के मुताबिक, ऐसे मामलों में 649 मतदाता दस्तावेज या आपत्तियां लेकर सामने आए। ERO और AERO स्तर पर मामलों की जांच की गई। इनमें 97 मामलों में अधिकारियों ने निष्कर्ष निकाला कि संबंधित मतदाता अंतिम निर्वाचन सूची में शामिल किए जा सकते हैं और पहले लिए गए फैसले को पलटने की जरूरत है।
ECINet में अटका ‘रोलबैक’ का रास्ता
समस्या यहीं से शुरू हुई। जिन 97 मामलों में पहले की कार्रवाई को बदलने की जरूरत थी, उस समय तक संबंधित फैसले ECINet में दर्ज हो चुके थे। लेकिन स्थानीय ERO/AERO के स्तर पर उन्हें वापस लेने का विकल्प उपलब्ध नहीं था।
रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने 11 फरवरी को गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) को बताया था कि सिस्टम में जरूरी rollback/reversion functionality और दस्तावेज दोबारा अपलोड करने की सुविधा अभी उपलब्ध नहीं कराई गई है। इससे पहले भी DEO, ERO और AERO स्तर से इस संबंध में कई अनुरोध भेजे जा चुके थे।
इसके बाद गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने मामले को चुनाव आयोग के दिल्ली स्थित अधिकारियों के सामने उठाया।
सात दिन में भेजे गए आठ ईमेल
रिपोर्ट के अनुसार, 13 फरवरी से 18 फरवरी के बीच गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की ओर से लगातार ईमेल भेजे गए। इनका मकसद 97 मतदाताओं के मामलों में पहले की कार्रवाई को पलटने के लिए सिस्टम में जरूरी सुविधा उपलब्ध कराना था।
13 फरवरी को भेजे गए संदेश में बताया गया कि 97 मामलों में रोलबैक की जरूरत है और अब तक भेजे गए ईमेल का जवाब नहीं मिला है।
14 फरवरी को दो बार अनुरोध भेजा गया। इनमें ECINet में रोलबैक/रिवर्ट और दस्तावेज दोबारा अपलोड करने की सुविधा जल्द उपलब्ध कराने की मांग की गई।
15 फरवरी को गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने लिखा कि रोलबैक विकल्प बेहद जरूरी है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का समय पर पालन कराने के लिए ERO/AERO अधिकारियों को कार्रवाई करने में सक्षम होना चाहिए।
16 फरवरी को भी कार्यालय ने जवाब नहीं मिलने की बात दोहराई।
17 फरवरी को अंतिम सूची जारी होने से चार दिन पहले 97 मामलों की सूची भेजते हुए अनुरोध किया गया कि इन मतदाताओं को SIR की अंतिम निर्वाचन सूची में शामिल करने के लिए जरूरी कार्रवाई की जाए।
18 फरवरी को दिल्ली से भी आया निर्देश
मामले में 18 फरवरी को चुनाव आयोग के उप निर्वाचन आयुक्त संजय कुमार ने IT विभाग की महानिदेशक सीमा खन्ना को ईमेल किया। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि ERO/AERO को अपने अधिकारों के तहत सुधारात्मक कार्रवाई करने में सक्षम होना चाहिए और IT सिस्टम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार जरूरी कार्रवाई को बाधित नहीं कर सकता। उन्होंने सिस्टम में आवश्यक सुविधा उपलब्ध कराने की बात कही।
इसके बावजूद 21 फरवरी को गोवा की अंतिम SIR मतदाता सूची प्रकाशित हुई और इन 97 मतदाताओं के नाम उसमें नहीं थे। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 20 सितंबर तक भी इन सभी 97 नामों को अंतिम सूची में शामिल नहीं किया गया था।
97 मतदाता किन सीटों से हैं?
रिपोर्ट के मुताबिक इन 97 मतदाताओं में 65 मतदाता तलेइगाओ विधानसभा क्षेत्र से हैं। बाकी मामले सेंट क्रूज, कुंबरजुआ, प्रियोल, मारगाओ, बेनौलिम और वेलिम विधानसभा क्षेत्रों से जुड़े हैं।
गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी संजय गोयल ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि इन मामलों को आयोग के सामने रखा गया था और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं के पक्ष में लिए गए फैसलों के बावजूद उन्हें शामिल करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। उन्होंने यह भी कहा कि ECINet में ERO स्तर पर मतदाताओं को दोबारा शामिल करने का कोई तंत्र होना चाहिए।
ECINet को लेकर क्यों उठे सवाल?
यह पूरा मामला ऐसे समय सामने आया है जब ECINet और ERONet के जरिए मतदाता सूची के प्रबंधन में केंद्रीकरण को लेकर चुनाव आयोग के भीतर भी सवाल उठाए गए हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की एक अलग रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। उनकी चिंताओं में चुनावी डेटाबेस के केंद्रीकरण और राज्य स्तर के अधिकारियों की भूमिका से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे।
हालांकि, इन आंतरिक आपत्तियों और गोवा के 97 मामलों को जोड़कर किसी व्यापक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित पक्षों के जवाब और पूरी प्रक्रिया को देखना जरूरी है।
कानून के तहत ERO की क्या भूमिका है?
कानून के अनुसार विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने की जिम्मेदारी Electoral Registration Officer यानी ERO की होती है। ERO दावे और आपत्तियों की सुनवाई करता है और संबंधित मामलों पर निर्णय लेता है।
ECINet और उसके रोल-मैनेजमेंट सिस्टम के जरिए इस प्रक्रिया को डिजिटल बनाया गया है। लेकिन किस अधिकारी को सॉफ्टवेयर में कौन-सी कार्रवाई करने की अनुमति होगी, यह सिस्टम में निर्धारित permissions पर निर्भर करता है। गोवा के मामले में विवाद का मुख्य बिंदु यही बना कि ERO/AERO ने दस्तावेजों की जांच के बाद जिन मामलों में पहले की कार्रवाई पलटने की जरूरत बताई, उस फैसले को सिस्टम में दर्ज करने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
अब 97 नामों को लेकर क्या सवाल?
गोवा SIR का यह मामला मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में स्थानीय अधिकारियों के फैसले और केंद्रीय डिजिटल सिस्टम के बीच तालमेल का सवाल सामने लाता है। 97 मतदाताओं के मामलों में स्थानीय स्तर पर दस्तावेज और आपत्तियां देखे जाने के बाद उन्हें शामिल करने की बात सामने आई, लेकिन सिस्टम में बदलाव का विकल्प उपलब्ध नहीं होने से वे अंतिम सूची में जगह नहीं बना सके।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची में नाम शामिल होना किसी नागरिक के मतदान के अधिकार से सीधे जुड़ा है। हालांकि 97 का आंकड़ा कुल मतदाताओं की तुलना में छोटा है, लेकिन इस मामले से यह सवाल जरूर उठता है कि अगर स्थानीय स्तर पर किसी अधिकारी द्वारा किसी मतदाता को शामिल करने का फैसला लिया जाता है, तो उसे डिजिटल सिस्टम में समय पर लागू करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
रिपोर्टर; ध्रुव सिंह, मुख्य संवाददाता पंजाब
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द
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