पराली जलाने से बढ़ेगा प्रदूषण? शिवराज सिंह चौहान ने राज्यों को दी सख्त सलाह, किसानों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर जोर
नई दिल्ली: अक्टूबर का दूसरा सप्ताह बीतने के साथ उत्तर और मध्य भारत के कई इलाकों में धान की कटाई का सीजन शुरू हो गया है। इसके साथ ही पराली जलाने की घटनाओं और वायु प्रदूषण बढ़ने की आशंका को लेकर केंद्र सरकार सक्रिय हो गई है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संबंधित राज्यों के अधिकारियों के साथ बैठक कर फसल अवशेष प्रबंधन को प्रभावी बनाने और किसानों को पराली के निपटारे के लिए बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने पर जोर दिया।
धान की कटाई के बाद खेतों को अगली फसल की बुवाई के लिए जल्दी तैयार करने की जरूरत होती है। ऐसे में कुछ किसान फसल के अवशेषों को जलाने का सहारा लेते हैं। इससे हवा में धुआं और सूक्ष्म कण बढ़ते हैं, जो वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। सरकार का जोर किसानों को ऐसी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर है, जिससे पराली जलाने की जरूरत कम हो और खेती का काम भी समय पर पूरा हो सके।
सिर्फ पराली नहीं जलाने की अपील से नहीं चलेगा काम
बैठक में शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसानों से केवल पराली नहीं जलाने की अपील करना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ उन्हें फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए जरूरी मशीनें, तकनीक और दूसरी सुविधाएं भी उपलब्ध करानी होंगी।
धान की कटाई के बाद किसानों के सामने अगली फसल की बुवाई का दबाव रहता है। यदि खेत से अवशेष हटाने में ज्यादा समय या खर्च लगे, तो किसान के लिए मुश्किल बढ़ सकती है। इसलिए सरकार और राज्य प्रशासन को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे किसान कम समय और उचित लागत में पराली का निपटारा कर सकें।
कृषि मंत्री ने राज्यों से फसल अवशेष प्रबंधन से जुड़ी स्वीकृत परियोजनाओं को बिना देरी जमीन पर उतारने को कहा। इसका उद्देश्य किसानों तक उपलब्ध संसाधनों और योजनाओं का लाभ समय पर पहुंचाना है।
मध्य प्रदेश और राजस्थान में बढ़े पराली जलाने के मामले
बैठक में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, कुछ राज्यों में पराली जलाने की घटनाओं में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मध्य प्रदेश में मामले 55 से बढ़कर 277 हो गए, जबकि राजस्थान में इनकी संख्या 20 से बढ़कर 60 बताई गई।
इन आंकड़ों के आधार पर मध्य प्रदेश में करीब 452 प्रतिशत और राजस्थान में 200 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इन राज्यों में बढ़ते मामलों को लेकर चिंता जताई गई और रोकथाम के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया गया।
पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि किसानों को फसल अवशेषों के निपटारे के लिए व्यवहारिक विकल्प मिलें। इसके लिए कृषि विभागों, स्थानीय प्रशासन और किसानों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पराली प्रबंधन के लिए केंद्र से आर्थिक मदद
केंद्र सरकार फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) योजना के तहत राज्यों को आर्थिक सहायता और कृषि मशीनों की उपलब्धता बढ़ाने पर काम कर रही है। जून 2026 में कृषि मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए इस योजना के तहत 544.15 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। राज्यों ने 46,000 से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें वितरित करने और 141 पराली आपूर्ति श्रृंखला परियोजनाएं विकसित करने का लक्ष्य रखा था। <
इस योजना का उद्देश्य किसानों को पराली खेत में मिलाने या उसे खेत से बाहर ले जाकर उपयोग करने के विकल्प उपलब्ध कराना है। फसल अवशेषों का इस्तेमाल बायोमास बिजली संयंत्रों, बायोगैस इकाइयों और अन्य औद्योगिक गतिविधियों में भी किया जा सकता है।
बैठक में पंजाब से लंबित उपयोगिता प्रमाणपत्र जल्द भेजने पर भी जोर दिया गया, ताकि उपलब्ध सरकारी धन के उपयोग की प्रक्रिया आगे बढ़ सके।
पूसा-44 की जगह कम अवधि वाली धान किस्मों पर जोर
पराली की समस्या को कम करने के लिए धान की ऐसी किस्मों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है, जिन्हें पकने में कम समय लगता है। लंबी अवधि वाली पूसा-44 जैसी किस्मों की कटाई देर से होने पर किसानों को गेहूं की बुवाई के लिए कम समय मिलता है।
कम अवधि वाली किस्में अपनाने से धान की कटाई और अगली फसल की बुवाई के बीच उपलब्ध समय बढ़ सकता है। इससे खेतों से फसल अवशेष हटाने या उनका प्रबंधन करने के लिए किसानों को अतिरिक्त समय मिल सकता है।
पराली जलाने पर रोक के लिए निगरानी बढ़ी
पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए पंजाब के अमृतसर और तरनतारन जैसे संवेदनशील जिलों में निगरानी बढ़ाई गई है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने 10 अक्टूबर को इन जिलों के अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की और खेतों में फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने पर जोर दिया। पंजाब के 18 जिलों में निगरानी दल भी तैनात किए गए हैं।
पराली जलाने से निकलने वाला धुआं सर्दियों में वायु प्रदूषण की समस्या को बढ़ा सकता है। हालांकि, दिल्ली-एनसीआर की खराब हवा के लिए पराली के अलावा वाहन, उद्योग, निर्माण कार्यों से उठने वाली धूल और अन्य स्रोत भी जिम्मेदार हैं।
किसानों को विकल्प देना सबसे जरूरी
पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान केवल जुर्माना लगाने या किसानों से अपील करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए खेतों में मशीनों की उपलब्धता, फसल अवशेषों के उपयोग के लिए बाजार, समय पर सरकारी सहायता और किसानों को नई तकनीक की जानकारी देना जरूरी है।
केंद्र और राज्य सरकारों के सामने चुनौती है कि धान की कटाई के व्यस्त मौसम में किसानों को व्यावहारिक विकल्प मिलें और पराली जलाने की घटनाओं को कम किया जा सके। आने वाले दिनों में पराली प्रबंधन के उपायों और विभिन्न राज्यों में दर्ज मामलों पर निगरानी महत्वपूर्ण रहेगी।

