दिल्ली के सरकारी स्कूलों की किताबों पर सियासी घमासान, सौरभ भारद्वाज ने उठाए गुणवत्ता और खरीद प्रक्रिया पर सवाल, शिक्षा मंत्री आशीष सूद का पलटवार
दिल्ली में मुफ्त बांटी जाने वाली स्कूली किताबों की गुणवत्ता और कीमत को लेकर आम आदमी पार्टी और भाजपा सरकार आमने-सामने आ गई हैं। AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने किताबों की छपाई, कागज और टेंडर प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जबकि शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने आरोपों का जवाब देते हुए सरकार की खरीद प्रक्रिया का बचाव किया है।
नई दिल्ली, 24 अक्टूबर 2026। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को मुफ्त उपलब्ध कराई जाने वाली पाठ्यपुस्तकों को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर किताबों की खरीद प्रक्रिया और उनकी गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। वहीं दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने इन आरोपों का खंडन करते हुए किताबों की कीमत और खरीद प्रक्रिया पर सफाई दी है।
इस विवाद के केंद्र में सरकारी स्कूलों के बच्चों को वितरित की जाने वाली किताबों की छपाई, कागज की गुणवत्ता, आकार और खरीद मूल्य जैसे मुद्दे हैं। दोनों राजनीतिक दलों के बीच शुरू हुई इस बहस ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और सरकारी धन के उपयोग को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
सौरभ भारद्वाज ने किताबों की गुणवत्ता पर उठाए सवाल
आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने दिल्ली सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए खरीदी गई किताबों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए बाजार में उपलब्ध एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों और सरकारी टेंडर के तहत छपवाई गई किताबों की तुलना की।
उन्होंने किताबों के कागज, आकार और प्रिंटिंग की गुणवत्ता में अंतर होने का दावा किया। भारद्वाज का कहना था कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अच्छी गुणवत्ता की पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब बाजार में एनसीईआरटी की किताबें उपलब्ध हैं, तो सरकारी टेंडर के तहत छपवाई जाने वाली किताबों की गुणवत्ता और उनकी कीमत का स्पष्ट आकलन किया जाना चाहिए।
भारद्वाज ने इस पूरे मामले में सरकार से जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की।
एनसीईआरटी और सरकारी टेंडर की किताबों की तुलना
विवाद का प्रमुख मुद्दा एनसीईआरटी की किताबों और दिल्ली सरकार की ओर से खरीदी गई पाठ्यपुस्तकों के बीच गुणवत्ता और कीमत का अंतर है।
सौरभ भारद्वाज ने दोनों तरह की किताबों की तुलना करते हुए दावा किया कि इनके कागज, आकार और छपाई में अंतर दिखाई देता है। उन्होंने सवाल किया कि सरकारी खरीद में किताबों की गुणवत्ता निर्धारित करने के लिए किन मानकों का पालन किया गया।
किताबों की गुणवत्ता को लेकर उठाए गए इन सवालों के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई। हालांकि, किताबों की वास्तविक गुणवत्ता का अंतिम निर्धारण तकनीकी परीक्षण और संबंधित खरीद दस्तावेजों की जांच के आधार पर ही किया जा सकता है।
शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने दिया जवाब
AAP नेता के आरोपों पर दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने पलटवार किया। उन्होंने किताबों की खरीद प्रक्रिया और कीमतों को लेकर सरकार का पक्ष रखा।
आशीष सूद ने बताया कि ‘मल्हार’ नाम की किताब दिल्ली सरकार ने महज 20 रुपये 61 पैसे में खरीदी है, जबकि एनसीईआरटी की इसी किताब की कीमत 65 रुपये बताई गई है।
शिक्षा मंत्री ने इस कीमत के अंतर का उल्लेख करते हुए विपक्ष के आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने किताबों के आकार और कीमतों को लेकर उठाए गए सवालों पर भी सफाई दी।
सरकार की ओर से प्रस्तुत इन आंकड़ों के बाद विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह बन गया है कि कम कीमत पर खरीदी गई किताबें निर्धारित गुणवत्ता मानकों को पूरा करती हैं या नहीं।
20.61 रुपये और 65 रुपये की किताब पर बहस
शिक्षा मंत्री के अनुसार, दिल्ली सरकार ने जिस मल्हार किताब को 20.61 रुपये में खरीदा, उसकी एनसीईआरटी कीमत 65 रुपये है। दोनों कीमतों के बीच 44.39 रुपये का अंतर है।
हालांकि, केवल कीमत के अंतर के आधार पर किसी खरीद को बेहतर या खराब नहीं कहा जा सकता। इसके लिए किताबों के पृष्ठों की संख्या, कागज की मोटाई, प्रिंटिंग की गुणवत्ता, आकार, बाइंडिंग और खरीद की शर्तों जैसे पहलुओं का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
सरकारी खरीद में बड़ी संख्या में किताबों का ऑर्डर दिए जाने के कारण प्रति पुस्तक लागत प्रभावित हो सकती है। वहीं गुणवत्ता संबंधी मानकों का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
ऐसे में इस विवाद का समाधान खरीद संबंधी दस्तावेजों और किताबों के तकनीकी परीक्षण से निकल सकता है।
सरकारी स्कूलों के बच्चों की शिक्षा से जुड़ा मामला
दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते हैं। इनमें आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के बच्चे भी शामिल हैं।
इन विद्यार्थियों को मुफ्त पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराना शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किताबें समय पर मिलें और उनकी गुणवत्ता अच्छी हो, यह विद्यार्थियों के शैक्षणिक हित से सीधे जुड़ा विषय है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पाठ्यपुस्तकों में स्पष्ट छपाई, मजबूत बाइंडिंग और पढ़ने योग्य कागज का होना जरूरी है। खराब छपाई या कमजोर कागज से किताबों के लंबे समय तक उपयोग में परेशानी हो सकती है।
इसलिए किताबों की खरीद प्रक्रिया में कीमत के साथ गुणवत्ता को भी प्राथमिकता देना आवश्यक माना जाता है।
किताबों की खरीद में पारदर्शिता का सवाल
सरकारी विभागों में पाठ्यपुस्तकों की खरीद आमतौर पर निर्धारित नियमों और निविदा प्रक्रिया के तहत की जाती है। इसमें किताबों की तकनीकी विशेषताएं, आपूर्ति की शर्तें और कीमत जैसे विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।
दिल्ली में उठे मौजूदा विवाद के बाद यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि संबंधित टेंडर में किन तकनीकी मानकों का उल्लेख किया गया था और आपूर्ति की गई किताबें उन मानकों के अनुरूप हैं या नहीं।
यदि सरकार संबंधित खरीद दस्तावेजों और गुणवत्ता जांच की जानकारी सार्वजनिक करती है, तो इस मामले में स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।
साथ ही विपक्ष की ओर से उठाए गए सवालों की तथ्यात्मक समीक्षा भी आवश्यक है, ताकि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
दिल्ली की राजनीति में शिक्षा का मुद्दा फिर गरमाया
दिल्ली की राजनीति में सरकारी स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था का मुद्दा लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। आम आदमी पार्टी अपने शासनकाल में शिक्षा क्षेत्र में किए गए कार्यों को प्रमुख उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती रही है।
दूसरी ओर भाजपा सरकार शिक्षा व्यवस्था में सुधार और सरकारी संसाधनों के बेहतर उपयोग पर जोर दे रही है।
ऐसे में पाठ्यपुस्तकों की खरीद और गुणवत्ता को लेकर शुरू हुआ यह विवाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक टकराव का नया विषय बन गया है।
AAP की ओर से किताबों की गुणवत्ता और खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जबकि भाजपा सरकार अपनी खरीद संबंधी स्थिति स्पष्ट कर रही है।
अब गुणवत्ता जांच और दस्तावेजों पर टिकी नजर
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जा रही किताबें निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरी उतरती हैं या नहीं।
इसके साथ ही किताबों की खरीद में अपनाई गई प्रक्रिया, तय कीमत और वास्तविक आपूर्ति की शर्तों की जानकारी भी महत्वपूर्ण है।
सौरभ भारद्वाज के आरोपों और शिक्षा मंत्री आशीष सूद की सफाई के बाद अब इस मामले में दस्तावेजी तथ्यों और गुणवत्ता संबंधी प्रमाणों की भूमिका अहम होगी।
फिलहाल दिल्ली के सरकारी स्कूलों की किताबों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज है। इस विवाद का केंद्र सरकारी खरीद की पारदर्शिता, शिक्षा पर खर्च होने वाले सार्वजनिक धन का उचित उपयोग और विद्यार्थियों को अच्छी गुणवत्ता की किताबें उपलब्ध कराना है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच दिल्ली के सरकारी स्कूलों के बच्चों को उचित कीमत पर गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किस तरह सुनिश्चित की जाएगी।

