राहुल गांधी-अखिलेश यादव के बीच दिखी दूरी, सपा-कांग्रेस गठबंधन पर उठे सवाल
नई दिल्ली। राजनीतिक कार्यक्रमों की तस्वीरें कई बार पर्दे के पीछे चल रहे सियासी समीकरणों की झलक दे देती हैं। मंगलवार को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA ब्लॉक के विरोध प्रदर्शन में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। प्रदर्शन में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव एक साथ मौजूद जरूर रहे, लेकिन दोनों नेताओं के बीच पहले जैसी राजनीतिक गर्मजोशी नजर नहीं आई।
राहुल गांधी की अगुवाई में हुए इस विरोध मार्च में शामिल होने के लिए अखिलेश यादव मंगलवार सुबह दिल्ली पहुंचे। हालांकि मार्च के दौरान राहुल गांधी जहां विपक्षी नेताओं के साथ आगे की कतार में नजर आए, वहीं अखिलेश यादव अपने पार्टी सांसदों के साथ उनसे एक कतार पीछे चलते दिखाई दिए। दोनों नेता एक ही प्रदर्शन का हिस्सा थे, लेकिन उनके बीच पहले दिखाई देने वाली सहजता और नजदीकी इस बार कम नजर आई।
‘यूपी के दो लड़कों’ वाली केमिस्ट्री गायब
राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी को 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान ‘यूपी के दो लड़कों’ के तौर पर काफी चर्चा मिली थी। चुनाव प्रचार के दौरान दोनों नेताओं की संयुक्त रैलियों और मंच साझा करने की तस्वीरों में आपसी तालमेल और गर्मजोशी साफ दिखाई देती थी। इसके अलावा Gen-Z से जुड़े प्रदर्शनों और राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान भी दोनों नेताओं के बीच ऐसी ही राजनीतिक केमिस्ट्री देखने को मिली थी।
लेकिन दिल्ली के ताजा प्रदर्शन में तस्वीर कुछ अलग रही। राहुल गांधी और अखिलेश यादव साथ तो दिखाई दिए, मगर दोनों के बीच पुरानी सहजता नहीं दिखी। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के रिश्तों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
30 सितंबर की INDIA बैठक से भी दूर रहे अखिलेश
सपा और कांग्रेस के बीच दूरी की चर्चा सिर्फ मंगलवार के प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। इससे पहले 30 सितंबर को दिल्ली में हुई INDIA गठबंधन की अहम बैठक में भी अखिलेश यादव शामिल नहीं हुए थे। उस समय वह सपा प्रत्याशी प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज नथवानी के राज्यसभा नामांकन से जुड़े कामों के सिलसिले में लखनऊ में थे।
ऐसे में लगातार दो घटनाओं को यूपी की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर तब, जब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे और गठबंधन की रणनीति पर लगातार चर्चा चल रही है।
सीट शेयरिंग बना बड़ा सवाल
उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती सीटों के बंटवारे को लेकर मानी जा रही है। दोनों दल सार्वजनिक तौर पर गठबंधन की एकजुटता का संदेश देना चाहते हैं, लेकिन चुनावी रणनीति और सीटों की संख्या को लेकर दोनों की अपनी-अपनी राजनीतिक जरूरतें हैं।
कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी राज्य में खुद को विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत के रूप में बनाए रखना चाहती है। ऐसे में सीट शेयरिंग का मुद्दा दोनों दलों के बीच संवेदनशील विषय बन गया है।
गठबंधन की मजबूरी या वोट बैंक का दबाव?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक सपा और कांग्रेस दोनों ही फिलहाल गठबंधन से पूरी तरह अलग होने का जोखिम नहीं लेना चाहते। दोनों पार्टियों के लिए साथ रहना चुनावी तौर पर फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इसके साथ ही दोनों अपने-अपने वोट बैंक और संगठनात्मक हितों को भी सुरक्षित रखना चाहती हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने मिलकर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन ने बीजेपी के खिलाफ विपक्षी वोटों को एकजुट करने में भूमिका निभाई थी। अब 2027 के विधानसभा चुनाव में उस समीकरण को दोहराना दोनों दलों के लिए बड़ी चुनौती होगी।
प्रदर्शन का मुद्दा अलग, लेकिन सियासी संदेश बड़ा
दिल्ली में हुए प्रदर्शन का तत्काल मुद्दा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष की आपत्तियां थीं। विपक्षी दल SIR यानी वोटर लिस्ट के Special Intensive Revision का विरोध कर रहे हैं और CEC के इस्तीफे की मांग उठा रहे हैं।
6 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव समेत INDIA ब्लॉक के कई नेता चुनाव आयोग की ओर मार्च कर रहे थे। पुलिस ने उन्हें आगे जाने से रोक दिया, जिसके बाद कई विपक्षी नेता धरने पर बैठ गए। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी बाद में आकाशवाणी भवन परिसर में भी धरने पर बैठे रहे।
हालांकि प्रदर्शन का मुद्दा चुनाव आयोग था, लेकिन राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच दिखाई दी दूरी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में सीट शेयरिंग और 2027 के चुनाव की रणनीति को लेकर दोनों दल किस तरह आगे बढ़ते हैं, इस पर सबकी नजर रहेगी।
रिपोर्टर; ध्रुव सिंह, मुख्य संवाददाता पंजाब दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द
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